
ऋषिकेश। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, ऋषिकेश में मानवता और करुणा की एक दुर्लभ मिसाल सामने आई है। मात्र आठ दिन की नवजात बच्ची की मृत्यु के बाद उसके माता-पिता ने भारी मन के बावजूद उसका शरीर चिकित्सा शिक्षा के लिए दान कर दिया। उनका उद्देश्य यह था कि उनकी बच्ची भले ही इस दुनिया में न रह सकी, लेकिन उसका देहदान भविष्य के डॉक्टरों की पढ़ाई और शोध में सहायक बनकर किसी और के जीवन के लिए उम्मीद का उजाला बन सके। यह निर्णय दुख की घड़ी में लिया गया एक ऐसा साहसिक कदम है, जिसने अस्पताल परिसर में सभी को भावुक कर दिया।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
देहदान चिकित्सा शिक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इससे मेडिकल छात्रों को मानव शरीर की संरचना और रोगों को समझने में मदद मिलती है। ऐसे उदाहरण बहुत कम देखने को मिलते हैं, विशेषकर तब, जब परिवार अपने नवजात को खोने के गहरे दुख से गुजर रहा हो।
आधिकारिक जानकारी
दो जनवरी को चमोली निवासी हंसी देवी पत्नी संदीप राम ने मेडिकल कॉलेज श्रीनगर में बच्ची को जन्म दिया। जन्म से ही शिशु की आंतों में तंत्रिका गुच्छों का अभाव पाया गया। चार जनवरी को नवजात को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ऋषिकेश रेफर किया गया, जहां ऑपरेशन किया गया। उपचार के दौरान रविवार को रिफ्रैक्टरी सेप्टिक शॉक के कारण नवजात की मृत्यु हो गई। एम्स के पीआरओ डॉ. श्रीलॉय मोहंती ने बताया कि परिजनों ने मृत नवजात का देहदान एनाटॉमी विभाग को किया है।
स्थानीय प्रतिक्रिया
एम्स के नर्सिंग स्टाफ ने परिजनों का संपर्क मोहन फाउंडेशन उत्तराखंड के प्रोजेक्ट लीडर संचित अरोड़ा से कराया। अरोड़ा, नेत्रदान कार्यकर्ता एवं लायंस क्लब ऋषिकेश देवभूमि के चार्टर अध्यक्ष गोपाल नारंग के साथ एम्स पहुंचे। परिजनों की सहमति से देहदान की औपचारिकताएं पूरी कर नवजात की देह एनाटॉमी विभाग को सौंपी गई।
विशेषज्ञ जानकारी
चिकित्सा शिक्षा से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि देहदान से छात्रों को व्यावहारिक अध्ययन का अवसर मिलता है, जिससे भविष्य में रोगियों के इलाज की गुणवत्ता बेहतर होती है।
आंकड़े / तथ्य
नवजात की उम्र आठ दिन थी। ऑपरेशन के बावजूद गंभीर संक्रमण के चलते उसकी जान नहीं बच सकी। देहदान की प्रक्रिया अस्पताल के एनाटॉमी विभाग में पूर्ण की गई।
आगे क्या होगा
एम्स के एनाटॉमी विभाग में यह देह चिकित्सा छात्रों के अध्ययन और शोध में उपयोग की जाएगी, जिससे आने वाले समय में कई मरीजों के उपचार में अप्रत्यक्ष रूप से सहायता मिल सकेगी।







