
नैनीताल—उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने सूखाताल झील के सौंदर्यीकरण मामले में जिलास्तरीय विकास प्राधिकरण द्वारा पेश की गई प्रगति रिपोर्ट पर असंतोष जताया है। मुख्य न्यायाधीश जी. नरेद्र और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने संबंधित अधिकारियों को 3 दिसंबर को पुनः अदालत में उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
सूखाताल झील का सौंदर्यीकरण नैनीताल के लिए एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय और पर्यटन परियोजना माना जा रहा है। हाईकोर्ट ने पूर्व में सौंदर्यीकरण कार्य पर लगी रोक हटाते हुए जिलास्तरीय विकास प्राधिकरण (DDA) को तीन महीने के भीतर कार्य पूरा करने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद कार्य की गति धीमी होने पर न्यायालय पहले भी नाराज़गी व्यक्त कर चुका है।
न्यायलय का प्राधिकरण की रिपोर्ट पर असंतोष
सुनवाई के दौरान प्राधिकरण ने प्रगति रिपोर्ट पेश की, लेकिन न्यायालय ने कहा कि रिपोर्ट अधूरी है और इसमें वर्तमान स्थिति स्पष्ट नहीं है। कोर्ट ने सवाल किया कि रोक हटने के बाद सौंदर्यीकरण का कितना कार्य हुआ और झील के किनारे अतिक्रमण को लेकर क्या निर्णय लिया गया।
वेटलैंड घोषणा पर विवाद
सुनवाई में प्राधिकरण की ओर से सूखाताल को वैटलैंड घोषित करने की प्रक्रिया का हवाला दिया गया। इस पर न्यायमित्र अधिवक्ता डॉ. कार्तिकेय हरि गुप्ता ने आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि यदि सूखाताल को वैटलैंड घोषित किया जा रहा है, तो फिर उसके नियमों और मानकों का पालन क्यों नहीं किया जा रहा।
न्यायालय की ओर से कड़े निर्देश
न्यायालय ने विभागों को 3 दिसंबर तक पूरी स्थिति स्पष्ट करते हुए विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने और संबंधित अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने के आदेश दिए। कोर्ट ने कहा कि पहले भी 7 नवंबर को एक सप्ताह के भीतर रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन उनका पालन नहीं किया गया।
न्यायमित्र कार्तिकेय हरि गुप्ता ने न्यायालय को बताया कि जुलाई 2024 में रोक हटाने के बाद भी सौंदर्यीकरण का कोई ठोस कार्य नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि आज पेश की गई रिपोर्ट वास्तविक प्रगति को नहीं दर्शाती।
स्थानीय प्रतिक्रिया
नैनीताल के स्थानीय निवासियों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि सूखाताल झील नगर की जल-प्रणाली और पारिस्थितिकी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वे चाहते हैं कि कोर्ट के निर्देशों का पालन हो और पारदर्शी तरीके से कार्य आगे बढ़े।
आगे क्या?
अब 3 दिसंबर को सम्बंधित विभागों को अदालत में उपस्थित रहकर स्थिति स्पष्ट करनी होगी। इसके आधार पर कोर्ट आगे के निर्देश जारी करेगा। माना जा रहा है कि यदि प्राधिकरण फिर से उचित रिपोर्ट पेश नहीं कर सका तो अदालत कड़ा रुख अपना सकती है।





