
नैनीताल: उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि दूसरे राज्यों की अनुसूचित जाति की वे महिलाएं, जो विवाह के बाद उत्तराखंड में बस गई हैं, राज्य की सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ नहीं ले सकेंगी। न्यायालय ने संबंधित याचिका को खारिज करते हुए कहा कि आरक्षण राज्य-विशिष्ट अधिकार है, जो निवास या विवाह के आधार पर स्वतः हस्तांतरित नहीं होता।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
उत्तराखंड में सरकारी नौकरियों में आरक्षण को लेकर कई बार यह प्रश्न उठता रहा है कि विवाह के बाद किसी अन्य राज्य से यहां बसने वाली अनुसूचित जाति/जनजाति की महिलाओं को क्या आरक्षण का अधिकार मिलना चाहिए। यह मामला विभिन्न भर्ती परीक्षाओं के दौरान विवाद का विषय बना रहा था, जिसके बाद कई याचिकाएं उच्च न्यायालय में दायर की गईं।
मामला क्या था
मामला अंशु सागर सहित कई याचिकाकर्ताओं से संबंधित था। अंशु सागर मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले की निवासी हैं और जन्म से जाटव जाति से आती हैं, जो यूपी में अनुसूचित जाति की सूची में शामिल है। उनका विवाह उत्तराखंड निवासी अनुसूचित जाति के युवक से हुआ, जिसके बाद उन्होंने जसपुर से जाति प्रमाण पत्र और स्थायी निवास प्रमाण पत्र प्राप्त किया।
इसके आधार पर उन्होंने उत्तराखंड के सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षक भर्ती में अनुसूचित जाति कोटे का दावा किया, लेकिन विभाग ने इसे अस्वीकार कर दिया। इसी आदेश को उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य सरकार ने अदालत में स्पष्ट किया कि—
- जाति जन्म से निर्धारित होती है, विवाह से नहीं बदलती।
- 16 फरवरी 2004 के शासनादेश और अन्य नियमों के अनुसार आरक्षण केवल उत्तराखंड के मूल निवासी अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए मान्य है।
- कोई व्यक्ति दूसरे राज्य का निवासी होने के बावजूद उत्तराखंड से प्रमाण पत्र प्राप्त कर ले, तब भी वह आरक्षण का हकदार नहीं होता।
सरकार ने यह भी बताया कि भले ही याचिकाकर्ता यूपी और उत्तराखंड दोनों जगह समान श्रेणी में आती हों, लेकिन जन्मस्थान यूपी होने के कारण वे उत्तराखंड के आरक्षण नियमों के तहत पात्र नहीं हैं।
हाईकोर्ट का निर्णय
न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने सभी याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि— “अनुसूचित जाति/जनजाति का आरक्षण राज्य-विशिष्ट है और विवाह या निवास परिवर्तन के साथ स्वचालित रूप से स्थानांतरित नहीं हो सकता। प्रवास के आधार पर आरक्षण देना संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत है।”
स्थानीय प्रतिक्रिया
कई शिक्षण भर्ती अभ्यर्थियों ने कहा कि कोर्ट का आदेश भविष्य के लिए स्पष्ट दिशा तय करता है, जिससे भ्रम की स्थिति समाप्त होगी।
एक स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा, “यह फैसला आरक्षण प्रणाली को पारदर्शी बनाएगा और नियमों के दुरुपयोग की संभावना कम होगी।”
आगे क्या
यह निर्णय उन सभी उम्मीदवारों के लिए नजीर बन सकता है, जो अन्य राज्यों से विवाह कर उत्तराखंड में बसते हैं और यहां के आरक्षित वर्ग में नौकरी का दावा करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में सरकार आरक्षण से जुड़े नियमों को और स्पष्ट स्वरूप दे सकती है।







