
देहरादून। सात साल पुराने बहुचर्चित कार्बेट बाघ शिकार प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट की सख्त रुख ने उत्तराखंड के वन विभाग में हड़कंप मचा दिया है। केंद्र और राज्य सरकार के साथ पूर्व मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक को नोटिस जारी होने के बाद विभाग के कई वर्तमान और पूर्व अधिकारी असहज हैं। वहीं, सीबीआई के पुराने हलफनामे और विभागीय पत्र फिर से सामने आने लगे हैं, जिससे मामले में नई हलचल पैदा हो गई है।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
कार्बेट टाइगर रिज़र्व से जुड़े इस शिकार प्रकरण ने 2017–18 में व्यापक चर्चा बटोरी थी। वर्षों से जांच अटकी रहने और विभागीय बैठकों के बाद भी मामले का समाधान नहीं हो सका। सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी और नोटिस कार्रवाई ने इस मुद्दे को एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता दिला दी है।
एनजीओ टाइगर आई की याचिका के बाद नैनीताल हाईकोर्ट, वन विभाग और विभिन्न जांच रिपोर्टों में इस प्रकरण का उल्लेख कई बार हुआ है, जिससे इसकी गंभीरता लगातार बढ़ती रही है।
आधिकारिक जानकारी
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, उत्तराखंड सरकार और उस समय के प्रमुख वन्यजीव प्रतिपालक को नोटिस जारी किया है। अदालत तीन सप्ताह बाद इस मामले की अगली सुनवाई करेगी, जिसमें रुकी पड़ी सीबीआई जांच पर बड़ा फैसला आने की संभावना जताई जा रही है।
सीबीआई ने वर्ष 2020 और 2023 में दायर शपथपत्रों में संकेत दिया था कि कुछ वन अधिकारियों और एक अंतरराष्ट्रीय शिकारी गिरोह के बीच संभावित मिलीभगत के प्रमाण मिले हैं। साथ ही, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के दिशा-निर्देशों के उल्लंघन का भी आरोप लगाया गया था।
वन विभाग के कई अधिकारी इस नोटिस कार्रवाई के बाद टिप्पणी करने से बचते नजर आए, जबकि कुछ से संपर्क नहीं हो सका।
स्थानीय प्रतिक्रिया
देहरादून और कार्बेट क्षेत्र के स्थानीय वन्यजीव प्रेमियों का कहना है कि वर्षों से लंबित इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की नई पहल से पारदर्शिता बढ़ने की उम्मीद है। कुछ स्थानीय गाइडों ने कहा कि इस प्रकार की घटनाएं प्रदेश की वन छवि को नुकसान पहुंचाती हैं और इनके निष्पक्ष समाधान की आवश्यकता है।
वर्षों पुराने दस्तावेज़ और जांच रिपोर्ट फिर चर्चा में
सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई के बाद कई पुराने दस्तावेज, नोटिंग्स और पत्राचार फिर से सामने आने लगे हैं।
- 10 जनवरी 2018 को नैनीताल हाईकोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया था।
- तत्कालीन प्रमुख वन संरक्षक जयराज की जांच रिपोर्ट में कई अधिकारियों को प्रशासनिक लापरवाही का दोषी बताया गया था।
राज्य सरकार का 27 अगस्त 2018 का एक गोपनीय पत्र भी चर्चा में है, जिसमें मार्च 2018 में एसटीएफ द्वारा पांच बाघों की खाल और हड्डियां बरामद होने का उल्लेख था। इसी पत्र में 28 जून 2018 की जांच आख्या के आधार पर तत्कालीन कार्बेट डायरेक्टर, डीएफओ कालागढ़ और डीएफओ लैंसडौन सहित कई अधिकारियों पर प्रशासनिक शिथिलता का आरोप दर्ज किया गया था।
आगे क्या
सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई में सीबीआई जांच बहाल करने या इसे आगे बढ़ाने पर निर्णय हो सकता है। यदि अदालत कड़ा रुख अपनाती है, तो इस प्रकरण में शामिल कई वर्तमान और पूर्व अधिकारियों की भूमिका दोबारा जांच के दायरे में आ सकती है।







