
देहरादून: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने उपनल कर्मचारियों के नियमितीकरण की मांग को सही ठहराते हुए उनके समर्थन में एक दिन का उपवास करने की घोषणा की है। रावत ने कहा कि राज्य सरकार उपनल कर्मियों की समस्याओं के प्रति संवेदनशील नहीं है, जबकि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय उनके पक्ष में हैं।
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पृष्ठभूमि / संदर्भ
प्रदेश में उपनल कर्मचारियों का नियमितीकरण लंबे समय से एक प्रमुख मुद्दा रहा है। विभिन्न विभागों में तैनात हजारों उपनल कर्मी स्थायी नियुक्ति और सेवा शर्तों में सुधार की मांग को लेकर लगातार आंदोलन कर रहे हैं। कई चरणों में वार्ता और आश्वासन के बावजूद समाधान न निकलने से कर्मचारियों में नाराजगी बढ़ी है।
हरीश रावत का समर्थन और उपवास का ऐलान
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि यदि सरकार अगले दो दिनों के भीतर उपनल कर्मचारियों के हित में कोई ठोस निर्णय नहीं लेती है, तो वह आंदोलनरत कर्मचारियों के साथ एक दिन का उपवास करेंगे। रावत ने कहा कि उपनल कर्मियों का मामला वर्षों से लटका हुआ है, जबकि उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय दोनों ही उनके पक्ष में निर्णय दे चुके हैं।
उन्होंने कहा: “उपनल कर्मचारी लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं। सरकार को संवेदनशील होना चाहिए और जल्द निर्णय लेना चाहिए।”
स्थानीय प्रतिक्रिया
उपनल कर्मचारियों और अतिथि शिक्षकों ने हरीश रावत के बयान का स्वागत किया है। कुछ कर्मचारियों का कहना है कि पूर्व मुख्यमंत्री का साथ मिलने से उनकी आवाज और बुलंद होगी। स्थानीय संगठनों ने भी सरकार से तत्काल समाधान निकालने की मांग की है।
अतिथि शिक्षकों पर रावत की टिप्पणी
हरीश रावत ने अतिथि शिक्षकों को “ग्रामीण शिक्षा के धनवंतरी” बताते हुए कहा कि यदि प्रदेश को अपनी शिक्षा प्रणाली को मजबूत रखना है, तो अतिथि शिक्षकों को सम्मान और सहयोग देना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि अतिथि शिक्षकों और उपनल कर्मियों दोनों के मुद्दों को जल्द समाधान की आवश्यकता है।
उपवास की शर्त और स्थान
रावत ने स्पष्ट किया कि यदि आंदोलन पर राजनीतिक दखल का आरोप लगाया जाता है, तो वह महात्मा गांधी की प्रतिमा के समक्ष उपवास करेंगे। उन्होंने कहा कि यह उपवास उनके लिए “एक नागरिक के रूप में उपनल कर्मियों के शोषण के प्रति प्रायश्चित” होगा।
आगे क्या?
उपनल कर्मचारी संगठन अब सरकार के अगले कदम पर नजर बनाए हुए हैं। यदि दो दिनों के भीतर कोई निर्णय नहीं होता, तो रावत का उपवास आंदोलन को नया मोड़ दे सकता है। राज्य सरकार की ओर से अब तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।






