
जौनसार: उत्तराखंड के जौनसार बावर जनजाति क्षेत्र में दीपावली का उत्सव अपनी अनूठी सांस्कृतिक और पर्यावरण अनुकूल परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। इस क्षेत्र की 39 खतों में से 9 खतों में नई दीपावली 19 अक्टूबर से शुरू हो रही है, जबकि 30 खतों में एक महीने बाद पुरानी दीपावली मनाई जाएगी। दोनों ही उत्सव पांच दिन तक चलते हैं और पूरी तरह पटाखा-मुक्त हैं, जिसमें चीड़ की लकड़ी के होले जलाकर दीपावली मनाई जाती है। यह परंपरा क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक है।
नई दीपावली: परंपरा और उत्सव
जौनसार बावर के बावर खत, देवघार खत, बाणाधार खत, लखौ खत, भरम खत, मशक, कैलो, धुनोऊ, और दसऊ खत के करीब 100 गांवों में नई दीपावली 19 से 23 अक्टूबर तक मनाई जा रही है। महासू देवता मंदिर हनोल, माता देवलाड़ी, बाशिक महासू मंदिर मैंद्रथ, शेडकुडिया महाराज मंदिर रायगी, और अणू व हेडसू में यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। दसऊ में चालदा महाराज के मंदिर में भी नई दीपावली का उत्सव होगा।
पांच दिवसीय उत्सव का कार्यक्रम इस प्रकार है:
- पहला दिन (19 अक्टूबर): जिशपिशा उत्सव।
- दूसरा दिन (20 अक्टूबर): रणदियाला उत्सव।
- तीसरा दिन (21 अक्टूबर): औंसा रात।
- चौथा दिन (22 अक्टूबर): भिरुड़ी उत्सव।
- पांचवां दिन (23 अक्टूबर): जंदोई मेला, जिसमें काठ से बने हाथी और हिरण का नृत्य होगा।
स्थानीय निवासी रमेश रावत ने कहा, “हमारी दीपावली में चीड़ के होले जलते हैं, पटाखे नहीं। यह पर्यावरण और परंपरा का सुंदर संगम है।” 2024 की एक सांस्कृतिक रिपोर्ट के अनुसार, जौनसार बावर में 80% उत्सव पर्यावरण अनुकूल हैं।
पुरानी दीपावली: 260 गांवों की परंपरा
30 खतों के 260 गांवों में, जैसे विशायल खत, समाल्टा, उदपाल्टा, फरटाड, कोरु, विशलाड, शिलगांव, बोंदूर, तपलाड, उपलगांव, बाना, बमटाड, लखवाड़, अठगांव, द्वार, बहलाड, सिली गोथान, पंजगांव आदि, पुरानी दीपावली 19 नवंबर से शुरू होगी। यह भी पांच दिन तक चलेगा और चीड़ के होले जलाकर मनाया जाएगा।
महासू देवता मंदिर के पुजारी अनिल शर्मा ने बताया, “पुरानी दीपावली हमारी प्राचीन परंपरा का हिस्सा है। यह उत्सव सामुदायिक एकता को बढ़ाता है।”
उत्सव की खासियत
नई और पुरानी दीपावली में पुरुष और महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में पंचायती आंगन में इकट्ठा होते हैं। हारूल, तांदी, रासो जैसे पारंपरिक नृत्य वाद्य यंत्रों के साथ किए जाते हैं। काठ के हाथी और हिरण का नृत्य उत्सव का मुख्य आकर्षण है। 2024 में इन उत्सवों में 50,000 से अधिक लोग शामिल हुए थे, जो क्षेत्र की सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाता है।
स्थानीय निवासी अनीता देवी ने कहा, “हमारी दीपावली में पटाखों का शोर नहीं, बल्कि प्रकृति और संस्कृति का सम्मान है।”
पर्यावरण अनुकूल उत्सव
जौनसार बावर की दीपावली पटाखा-मुक्त होने के कारण पर्यावरण के लिए अनुकूल है। चीड़ की लकड़ी के होले जलाने की परंपरा न केवल सांस्कृतिक है, बल्कि प्रदूषण मुक्त भी है। 2024 की पर्यावरण रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड के जनजातीय क्षेत्रों में 90% त्योहार पर्यावरण अनुकूल हैं।







