
देहरादून: उत्तराखंड की धामी सरकार द्वारा मदरसा बोर्ड को भंग करने के निर्णय पर देश के प्रमुख मुस्लिम धर्मगुरुओं और संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई है। मुस्लिम विद्वानों ने इस कदम को भारतीय संविधान और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर सीधा हमला करार देते हुए सरकार से इसे तत्काल वापस लेने की मांग की है। इस मुद्दे पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड एक स्वर में सामने आए हैं।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
धामी सरकार के निर्णय के अनुसार, 30 जून को उत्तराखंड मदरसा बोर्ड का कार्यकाल समाप्त हो जाएगा। इसके बाद 1 जुलाई से राज्य के सभी मदरसे उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के तहत संचालित होंगे और उन्हें उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड से मान्यता लेनी होगी। इसी क्रम में राज्य सरकार ने अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन कर दिया है और संबंधित आदेश भी जारी किए जा चुके हैं।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया
इस्लामिक सेंटर ऑफ इंडिया के चेयरमैन और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने इस फैसले को अफसोसनाक बताया। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को अपने शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और संचालित करने का पूर्ण अधिकार देता है।
उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले इस अधिकार की पुष्टि करते हैं और हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों के संचालन को वैध बताया है। ऐसे में मदरसा बोर्ड को भंग करना कानून और लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है।
स्थानीय प्रतिक्रिया
ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि एक ओर सबका साथ-सबका विकास की बात होती है, वहीं दूसरी ओर मदरसों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने इसे दोहरे मापदंड की राजनीति करार दिया।
आंकड़े और तथ्य
धर्मगुरुओं ने कहा कि मदरसों ने देश को आईएएस, आईपीएस, डॉक्टर, इंजीनियर और जनप्रतिनिधि दिए हैं और स्वतंत्रता आंदोलन में भी इन संस्थानों की अहम भूमिका रही है। उनका कहना है कि ऐसे ऐतिहासिक योगदान वाले शिक्षण संस्थानों के खिलाफ लिया गया यह फैसला समाज में असंतोष बढ़ा सकता है।
आगे क्या होगा
मुस्लिम संगठनों ने उत्तराखंड सरकार से इस फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील की है। उनका कहना है कि यदि निर्णय वापस नहीं लिया गया, तो वे संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से विरोध जारी रखेंगे। उधर, सरकार द्वारा गठित अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के तहत नई व्यवस्था लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।
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