
देहरादून: उत्तराखंड में एक बार फिर ‘माननीयों’ की सुविधाओं को लेकर सियासी और सार्वजनिक बहस तेज हो गई है। राज्य, जिसे सरकार खुद आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण बताती रही है और जिस पर करीब 80 हजार करोड़ रुपये का कर्ज बताया जा रहा है, उसी राज्य में मंत्रियों के खर्चों में कटौती के बजाय यात्रा भत्ते में 50 प्रतिशत बढ़ोतरी का फैसला लिया गया है। इस निर्णय के बाद सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठ रहे हैं—और यह सवाल सिर्फ विपक्ष ही नहीं, आम जनता भी पूछ रही है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
सरकार ने वर्ष 2026 की शुरुआत में मंत्रियों के यात्रा भत्ते में वृद्धि का निर्णय लिया। इसके तहत अब मंत्रियों को यात्रा व्यय के लिए प्रति माह 60 हजार रुपये की जगह 90 हजार रुपये मिलेंगे, यानी सीधे तौर पर 30 हजार रुपये की बढ़ोतरी। सरकार का तर्क है कि मंत्रियों को अलग-अलग जिलों और क्षेत्रों में लगातार दौरे करने पड़ते हैं, इसलिए यात्रा व्यय बढ़ाना आवश्यक था।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया
यह निर्णय 29 जनवरी 2026 को जारी अधिसूचना के बाद लागू किया गया। मंत्री परिषद अनुभाग द्वारा जारी आदेश के अनुसार उत्तर प्रदेश मंत्री यात्रा भत्ता नियमावली, 1997 में संशोधन किया गया, जिसे उत्तर प्रदेश मंत्री (यात्रा भत्ता) (संशोधन) नियमावली, 2026 के रूप में लागू किया गया है।
संशोधन के तहत नियम-4 में बदलाव करते हुए मुख्यमंत्री, कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री और उप मंत्री—सभी को उत्तराखंड या भारत के भीतर आधिकारिक यात्राओं पर प्रति कैलेंडर माह अधिकतम 90 हजार रुपये तक खर्च लेने की अनुमति दी गई है। पहले यह सीमा 60 हजार रुपये थी।
स्थानीय प्रतिक्रिया
विपक्ष ने इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने तंज कसते हुए कहा कि सरकार को भत्ते बढ़ाने से पहले प्रदेश में फैले भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी पर लगाम लगानी चाहिए। उनका कहना है कि जब तक सिस्टम साफ नहीं होगा, ऐसे फैसले जनता को गलत संदेश देते रहेंगे।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने भी सवाल उठाया कि जब राज्य पर कर्ज तेजी से बढ़ रहा है, तब मंत्रियों और विधायकों से जुड़े खर्चों में हर साल बढ़ोतरी क्यों की जा रही है। उन्होंने प्रभारी मंत्रियों की जिलों में सक्रियता, बैठकों और योजनाओं की समीक्षा को सार्वजनिक करने की मांग भी की।
आंकड़े और तथ्य
बीते वर्षों के फैसलों पर नजर डालें तो यह बढ़ोतरी कोई एकल निर्णय नहीं दिखती।
अगस्त 2024 में विधायकों के वेतन और भत्तों में भारी बढ़ोतरी की गई थी, जिससे कुल राशि करीब 2.90 लाख रुपये से बढ़कर लगभग 4 लाख रुपये हो गई। इससे पहले 2023 में दायित्वधारियों के मानदेय में करीब 45 हजार रुपये की वृद्धि की गई थी। 2025 में पूर्व विधायकों की पेंशन बढ़ाने का फैसला भी लिया गया।
आगे क्या होगा
भाजपा ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कहा कि सरकार और संगठन नियमित रूप से मंत्रियों-विधायकों के कामकाज की मॉनिटरिंग करते हैं और महंगाई को देखते हुए समय-समय पर ऐसे फैसले हर सरकार लेती है।
वहीं, राजनीतिक विश्लेषक अनूप नौटियाल का मानना है कि चुनाव से पहले भत्ते बढ़ाना एक रणनीतिक कदम भी हो सकता है। उन्होंने कहा कि सरकार को यह भी दिखाना चाहिए कि बढ़े हुए भत्तों का लाभ जमीनी स्तर पर जनता तक कितना पहुंच रहा है।
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