
देहरादून: उत्तराखंड के जंगलों और उनसे सटे इलाकों में इन दिनों बाघों के हमलों की घटनाएं सामने आ रही हैं, जिससे वन विभाग के साथ-साथ स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ गई है। वन विभाग के अनुसार, इस समय जंगलों में टाइगर्स का ब्रीडिंग सीजन चल रहा है, जिस वजह से बाघ सामान्य दिनों की तुलना में अधिक आक्रामक और संवेदनशील हो जाते हैं। इस दौरान जरा-सी हलचल या इंसानी मौजूदगी भी उन्हें उकसा सकती है। हाल के महीनों में दर्ज मामलों ने साफ कर दिया है कि जंगलों में लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है, इसलिए इस समय विशेष सतर्कता बेहद जरूरी मानी जा रही है।
मामले की अहमियत
यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि उत्तराखंड के कई गांव सीधे जंगलों से सटे हुए हैं। ग्रामीणों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी खेती, पशुपालन और जंगल पर निर्भर गतिविधियों से जुड़ी हुई है। ब्रीडिंग सीजन के दौरान बाघों का आक्रामक व्यवहार इंसान और वन्यजीव के बीच टकराव की आशंका को बढ़ा देता है, जिससे जान-माल दोनों का नुकसान हो सकता है।
पहले भी हो चुकी हैं ऐसी घटनाएं
पिछले कुछ महीनों में राज्य के अलग-अलग वन क्षेत्रों में टाइगर अटैक की घटनाएं दर्ज की गई हैं। भले ही तेंदुए या भालू की तुलना में बाघों के हमले कम होते हों, लेकिन जब सामना होता है तो खतरा कहीं अधिक गंभीर होता है।
आधिकारिक जानकारी
वन विभाग के मुताबिक, ब्रीडिंग सीजन में बाधिन (मादा बाघ) अपने और अपने शावकों के लिए सुरक्षित जगह तलाशती है। यदि उसके साथ बच्चे हों, तो वह और भी ज्यादा सतर्क और आक्रामक हो जाती है। ऐसे में अगर कोई व्यक्ति अनजाने में उनके करीब पहुंच जाए, तो टाइग्रेस अपने बचाव में तुरंत हमला कर सकती है।
प्रमुख वन संरक्षक (हॉफ) रंजन कुमार मिश्रा ने कहा कि यह समय जंगलों में विशेष सावधानी बरतने का है। उन्होंने लोगों से अपील की है कि वे अकेले जंगल में न जाएं और समूह में ही आवाजाही करें।
स्थानीय प्रतिक्रिया
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि बाघों की बढ़ती गतिविधियों से डर का माहौल है। जंगल से सटे गांवों में रहने वाले लोग खासकर बच्चों की सुरक्षा को लेकर ज्यादा चिंतित नजर आ रहे हैं।
विशेषज्ञ की राय
वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रीडिंग सीजन में टाइगर्स का स्वभाव रक्षात्मक और आक्रामक हो जाता है। ऐसे समय में इंसानी दखल जितना कम होगा, टकराव की आशंका उतनी ही घटेगी।
आंकड़े और तथ्य
- वर्ष 2025 में बाघों के हमलों में 13 लोगों की मौत हुई है।
- इसी अवधि में 5 लोग घायल बताए गए हैं।
- बाघों के हमले भले कम हों, लेकिन इनमें जान का खतरा सबसे ज्यादा रहता है।
आगे क्या होगा
वन विभाग की ओर से गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक किया जा रहा है। ग्रामीणों को सुबह और शाम के समय जंगल में जाने से बचने, मोबाइल या शोर करने वाले उपकरण साथ रखने और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत वन विभाग को देने की सलाह दी जा रही है। विभाग का मानना है कि लोगों की सतर्कता ही इस समय सबसे बड़ा बचाव है।







