
Supreme Court of India: यूजीसी के नए कानून को लेकर चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। कई याचिकाकर्ताओं ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा अधिसूचित नए नियमों को चुनौती देते हुए इन्हें संविधान और यूजीसी अधिनियम, 1956 का उल्लंघन बताया है। यह मामला 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियम, 2026’ से जुड़ा है।
याचिकाएं विशेष रूप से इन नियमों के रेगुलेशन 3(सी) के खिलाफ दायर की गई हैं, जिसे याचिकाकर्ताओं ने मनमाना, बहिष्करणकारी और भेदभावपूर्ण करार दिया है। उनका कहना है कि यह प्रावधान उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता के उद्देश्य के विपरीत है।
क्या है विवाद की जड़
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि नए यूजीसी नियम में जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को बेहद सीमित कर दिया गया है। नियम के अनुसार, जाति के आधार पर भेदभाव को केवल अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तक सीमित माना गया है।
इस प्रावधान के तहत केवल इन्हीं वर्गों को कानूनी रूप से पीड़ित माना गया है, जबकि सामान्य या उच्च जाति के व्यक्तियों को, भले ही उनके साथ गंभीर भेदभाव हुआ हो, इस दायरे से बाहर रखा गया है।
याचिकाकर्ताओं की दलील
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी है कि भेदभाव की गंभीरता को व्यक्ति की जाति से जोड़ना समानता के संवैधानिक सिद्धांत के खिलाफ है। उनका कहना है कि यह नियम यह मानकर चलता है कि सामान्य या उच्च जाति के लोग कभी जाति-आधारित भेदभाव का शिकार हो ही नहीं सकते, जो कि सामाजिक वास्तविकताओं को पूरी तरह नकारता है।
राज्य-प्रायोजित भेदभाव का आरोप
इस मामले में दाखिल एक याचिका में मृत्युंजय तिवारी ने आरोप लगाया है कि यह नियम अप्रत्यक्ष रूप से भेदभाव को वैध बनाता है। याचिका में कहा गया है कि जब नियम यह स्वीकार ही नहीं करता कि सामान्य या उच्च जाति के लोग भी भेदभाव के शिकार हो सकते हैं, तो यह संविधान की दृष्टि से अस्वीकार्य राज्य-प्रायोजित भेदभाव के समान है।
संविधान और यूजीसी अधिनियम का उल्लंघन?
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह नियम न केवल भारतीय संविधान में दिए गए समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है, बल्कि यूजीसी अधिनियम, 1956 की मूल भावना के भी खिलाफ है। उनका तर्क है कि यूजीसी का दायित्व उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता और निष्पक्षता को बढ़ावा देना है, न कि किसी वर्ग को कानूनी संरक्षण से बाहर करना।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई की तारीख तय नहीं की है, लेकिन यह विवाद उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव की परिभाषा और समानता के अधिकार को लेकर एक बड़े संवैधानिक विमर्श का रूप ले सकता है।







