
ऋषिकेश के बापूग्राम स्थित भूमियाल देवता मंदिर के समीप बापूग्राम बचाओ संघर्ष समिति की जनसभा आयोजित की गई, जिसमें बापूग्राम, बीसबीघा, मीरानगर और गीतानगर सहित आसपास के क्षेत्रों के बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। जनसभा का केंद्र बिंदु वन भूमि प्रकरण रहा। जनप्रतिनिधियों और स्थानीय नागरिकों ने इन बस्तियों के अस्तित्व को बचाने, वनाधिकारों की मान्यता और आगे की रणनीति पर विस्तार से चर्चा की। वक्ताओं ने कहा कि पीढ़ियों से बसे लोगों को अपराधी मानना अन्याय है और जनहित में तत्काल समाधान जरूरी है।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
सभा में वक्ताओं ने बताया कि वर्ष 2006 में पारित अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वनाधिकारों की मान्यता) कानून की मूल भावना यह थी कि पीढ़ियों से वन या वन भूमि पर रहने वाले लोगों को मालिकाना हक दिया जाए। लेकिन उत्तराखंड में इस केंद्रीय कानून की प्रक्रिया शुरू न होने से हजारों परिवार असमंजस और असुरक्षा में हैं। बापूग्राम और पशुलोक जैसे क्षेत्रों के निवासी खुद को अन्य परंपरागत वन निवासी की श्रेणी में बताते हैं और कहते हैं कि वे 1947 से यहां रह रहे हैं, जो वन संरक्षण कानून लागू होने से भी दशकों पहले का समय है।
आधिकारिक जानकारी
जनसभा में यह मांग रखी गई कि राज्य सरकार इन आबादी वाले क्षेत्रों में वनाधिकारों की प्रक्रिया तत्काल शुरू करे। साथ ही बापूग्राम, पशुलोक और शिवाजी नगर जैसे पुराने बसे क्षेत्रों को वन भूमि से डी-नोटिफाई कर राजस्व ग्राम घोषित किया जाए। वक्ताओं ने कहा कि वन विभाग के कानून घने जंगलों के संरक्षण के लिए हैं, न कि 75 साल पुरानी पक्की बस्तियों, बाजारों और स्कूलों पर लागू करने के लिए।
स्थानीय प्रतिक्रिया
स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों से बसे होने के बावजूद उन्हें बेदखली का डर दिखाया जा रहा है। उनका मानना है कि यदि सरकार संवेदनशीलता दिखाते हुए राजस्व ग्राम का दर्जा देती है, तो हजारों परिवारों को स्थायी राहत मिलेगी और क्षेत्र का नियोजित विकास संभव हो सकेगा।
आंकड़े / विवरण
सभा में बताया गया कि बापूग्राम, बीसबीघा, मीरानगर, गीतानगर और पशुलोक क्षेत्रों में हजारों परिवार निवास करते हैं। ये बस्तियां स्कूलों, बाजारों और सार्वजनिक सुविधाओं के साथ दशकों से विकसित हैं।
आगे क्या होगा
संघर्ष समिति ने संकेत दिए कि यदि मांगों पर शीघ्र निर्णय नहीं हुआ तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा। आने वाले दिनों में प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से संवाद बढ़ाने के साथ-साथ कानूनी विकल्पों पर भी विचार किया जाएगा।







