
देहरादून: साल 2026 की शुरुआत के साथ ही उत्तराखंड की राजनीति में चुनावी हलचल तेज हो गई है। 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर सभी राजनीतिक दल रणनीति और संगठन को मजबूत करने में जुटे हैं। लेकिन इस माहौल के बीच कांग्रेस एक बार फिर अपनी पुरानी समस्या—प्रदेश कार्यकारिणी के गठन—में उलझी नजर आ रही है। लंबे समय से कार्यकर्ताओं को जिस सूची का इंतजार है, वह अब भी बैठकों और फाइलों तक सीमित है, जिससे पार्टी की जमीनी सक्रियता और चुनावी तैयारी पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी बीते कई वर्षों से पूर्ण कार्यकारिणी के बिना काम कर रही है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष करन मेहरा अपने लगभग तीन साल के कार्यकाल में नई कार्यकारिणी की घोषणा नहीं कर सके। नतीजतन पार्टी को पुरानी टीम के सहारे ही संगठनात्मक जिम्मेदारियां निभानी पड़ीं, जिसका असर आंदोलनों और जमीनी गतिविधियों पर साफ दिखाई देता रहा।
आधिकारिक जानकारी
करन मेहरा के बाद गणेश गोदियाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने पर संगठन में नई ऊर्जा की उम्मीद जगी। माना जा रहा था कि दिसंबर 2025 के अंत तक या नए साल की शुरुआत में प्रदेश कार्यकारिणी घोषित कर दी जाएगी। प्रदेश स्तर पर मंथन और दिल्ली में सूची भेजे जाने की चर्चाएं भी सामने आईं, लेकिन अंतिम मंजूरी अब तक नहीं मिल सकी।
प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता शीशपाल गुसाईं का कहना है कि अध्यक्ष को हाल ही में जिम्मेदारी मिली है और कार्यकारिणी का गठन जल्द किया जाएगा। उनके अनुसार नई टीम के गठन के बाद कांग्रेस भाजपा सरकार की नीतियों के खिलाफ अधिक संगठित और आक्रामक तरीके से जनता के बीच जाएगी।
स्थानीय प्रतिक्रिया
पार्टी कार्यकर्ताओं का कहना है कि कार्यकारिणी में देरी से संगठनात्मक ढांचा अधूरा नजर आता है। कई जिलों में आंदोलन और कार्यक्रम सीमित स्तर पर ही हो पा रहे हैं। कार्यकर्ताओं में यह चिंता भी है कि चुनाव से पहले यदि संगठन पूरी तरह सक्रिय नहीं हुआ, तो इसका सीधा असर चुनावी प्रदर्शन पर पड़ेगा।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
भाजपा इस पूरे घटनाक्रम को कांग्रेस की कमजोरी के रूप में पेश कर रही है। भाजपा विधायक खजान दास ने कहा कि कांग्रेस की असली समस्या उसकी अंदरूनी गुटबाजी है। उनके अनुसार प्रदेश कार्यकारिणी की देरी इसी आपसी कलह का परिणाम है, जबकि भाजपा ने अपने संगठनात्मक ढांचे को पहले ही मजबूत कर लिया है।
आगे क्या होगा
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि कांग्रेस जल्द ही गुटबाजी से ऊपर उठकर प्रदेश कार्यकारिणी का गठन नहीं करती, तो 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उसकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि पार्टी नेतृत्व संगठन को किस गति से मजबूत करता है और चुनावी मैदान में किस रणनीति के साथ उतरता है।





