
नैनीताल में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग में अपात्र विकलांगता प्रमाण पत्रों के जरिए आरक्षण का लाभ लेने के मामले को गंभीरता से लेते हुए सख्त रुख अपनाया है। मंगलवार, 30 दिसंबर को इस संबंध में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट राज्य सरकार द्वारा पेश की गई सूची से संतुष्ट नहीं हुई। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने स्वास्थ्य सचिव को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत में पेश होने के निर्देश दिए हैं। यह मामला इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि इससे वास्तविक दिव्यांग अभ्यर्थियों के संवैधानिक अधिकार प्रभावित होने की बात सामने आ रही है।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
उत्तराखंड में राज्य गठन के बाद शिक्षा विभाग में दिव्यांग आरक्षण के तहत हुई नियुक्तियों को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। आरोप है कि अपात्र लोगों ने कथित रूप से फर्जी या संदिग्ध प्रमाण पत्रों के आधार पर आरक्षण का लाभ लिया। इससे न केवल व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हुए हैं, बल्कि वास्तविक दिव्यांग उम्मीदवारों के अधिकारों को भी नुकसान पहुंचा है। इसी संदर्भ में यह जनहित याचिका दायर की गई थी।
आधिकारिक जानकारी
इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश जी नरेंद्र और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ में हुई।
पूर्व आदेश के तहत राज्य सरकार ने जो सूची कोर्ट में पेश की, उस पर अदालत ने असंतोष जताया। कोर्ट को बताया गया कि शिक्षा विभाग में दिव्यांग आरक्षण के तहत कुल 52 पदों पर हुई नियुक्तियों में से 13 को ही राज्य मेडिकल बोर्ड ने सही पाया है। बाकी कर्मचारियों में से कुछ पुनर्मूल्यांकन के दौरान अनुपस्थित रहे, जबकि कुछ के प्रमाण पत्रों में भिन्नता पाई गई या उन्हें दिव्यांग श्रेणी में योग्य नहीं माना गया।
स्थानीय प्रतिक्रिया
स्थानीय स्तर पर दिव्यांग संगठनों से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि इस तरह के मामलों में सख्ती नहीं की गई, तो वास्तविक जरूरतमंद उम्मीदवारों के साथ अन्याय होता रहेगा।
कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी उम्मीद जताई है कि कोर्ट की सख्ती से इस मामले में पारदर्शी कार्रवाई सामने आएगी।
संख्यात्मक विवरण
शिक्षा विभाग में दिव्यांग आरक्षण के तहत 52 नियुक्तियों में से केवल 13 को सही पाया गया है। शेष कर्मचारियों में कई लोग वर्ष 2022 में हुए मेडिकल बोर्ड के पुनर्मूल्यांकन में उपस्थित नहीं हुए या उनके प्रमाण पत्र संदिग्ध पाए गए।
आगे क्या होगा
याचिकाकर्ता के वकील गौरव पालीवाल ने अदालत को बताया कि पूर्व में प्रशासनिक स्तर पर की गई शिकायतों पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई। अब हाईकोर्ट ने 31 दिसंबर को स्वास्थ्य सचिव को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होने के आदेश दिए हैं। अगली सुनवाई में कोर्ट इस पूरे मामले में सरकार से विस्तृत जवाब और आगे की कार्रवाई पर स्पष्ट रुख की अपेक्षा कर रही है।





