
देहरादून: बाबरी मस्जिद से जुड़े बयान को लेकर उत्तराखंड की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के एक बयान के बाद कांग्रेस और भाजपा के बीच तीखी बयानबाज़ी शुरू हो गई है। दोनों दल एक-दूसरे पर सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने और तुष्टिकरण की राजनीति करने के आरोप लगा रहे हैं। यह विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब राज्य में राजनीतिक गतिविधियां तेज़ होती दिख रही हैं।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
बाबरी मस्जिद और उससे जुड़े मुद्दे देश की राजनीति में लंबे समय से संवेदनशील रहे हैं। उत्तराखंड में भी जब-जब इस विषय पर बयान सामने आते हैं, सियासी माहौल गरमा जाता है। इस बार भी पूर्व मुख्यमंत्री के बयान के बाद राजनीतिक दल आमने-सामने आ गए हैं।
हरीश रावत का बयान
वरिष्ठ कांग्रेसी नेता हरीश रावत ने पश्चिम बंगाल में बाबरी मस्जिद निर्माण और मुस्लिम तुष्टिकरण के संदर्भ में कहा कि वह देश के पहले राजनीतिक व्यक्ति हैं, जिन्होंने बंगाल में बाबर के नाम पर बाबरी मस्जिद बनाए जाने का विरोध किया। उन्होंने इसे देश के सामाजिक सद्भाव को तोड़ने की कुचेष्टा बताया और आरोप लगाया कि इसके पीछे भाजपा का हाथ है। हरीश रावत ने दावा किया कि भाजपा ने समाज को बांटने और अल्पसंख्यकों के वोट काटने के उद्देश्य से अलग-अलग विंग खड़े कर रखे हैं।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप
हरीश रावत ने कहा कि भाजपा चुनावों में हिंदू-मुसलमान के एजेंडे पर राजनीति करती है, ताकि बेरोजगारी, महंगाई, कानून व्यवस्था, महिलाओं पर अत्याचार, कुपोषण और पलायन जैसे वास्तविक मुद्दों से जनता का ध्यान हटाया जा सके।
भाजपा का पलटवार
हरीश रावत के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा प्रदेश प्रवक्ता मथुरा दत्त जोशी ने कहा कि देश कांग्रेस और हरीश रावत की राजनीतिक रणनीति को भली-भांति जानता है। उन्होंने कहा कि भाजपा सनातन संस्कृति की बात करती है और उसी का समर्थन करती है। मथुरा दत्त जोशी ने आरोप लगाया कि हरीश रावत के अतीत में जुम्मे की नमाज की छुट्टी, यूनिवर्सिटी और मस्जिद से जुड़े कई बयान रहे हैं, जिन्हें लेकर सच्चाई किसी से छिपी नहीं है।
स्थानीय प्रतिक्रिया
स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस तरह के बयान चुनावी माहौल में राजनीतिक ध्रुवीकरण को और तेज कर सकते हैं। आम लोगों के बीच भी इस मुद्दे को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।
आगे क्या होगा
राजनीतिक दलों के बीच बयानबाज़ी के और तेज होने की संभावना जताई जा रही है। आने वाले दिनों में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही इस मुद्दे पर अपनी-अपनी रणनीति के तहत जनसभाओं और सोशल मीडिया के माध्यम से जनता तक अपनी बात पहुंचा सकते हैं।





