
देहरादून: देहरादून स्थित डीबीएस महाविद्यालय के भूगर्भ विज्ञान विभाग ने गंगोत्री ग्लेशियर के तेजी से सिकुड़ने को लेकर एक गंभीर अध्ययन रिपोर्ट तैयार की है। रिपोर्ट के अनुसार पिछले लगभग 60 वर्षों में गंगोत्री ग्लेशियर करीब 36 किलोमीटर तक सिमट चुका है। वैज्ञानिकों ने इसके पीछे वैश्विक तापमान वृद्धि, अवैज्ञानिक निर्माण, नदी घाटियों में खनन, जंगलों की कटाई और मानव बसावट के विस्तार को प्रमुख कारण बताया है। ग्लेशियर के लगातार सिकुड़ने से उत्तरकाशी क्षेत्र में आपदाओं का खतरा भी बढ़ता जा रहा है।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
गंगोत्री ग्लेशियर गंगा नदी का प्रमुख स्रोत है और हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र में इसकी अहम भूमिका है। बीते वर्षों में उत्तरकाशी और आसपास के क्षेत्रों में आई आपदाओं के बाद ग्लेशियरों की स्थिति पर दोबारा गंभीर अध्ययन की आवश्यकता महसूस की गई, जिसके तहत डीबीएस कॉलेज के भूगर्भ विज्ञान विभाग ने यह शोध आगे बढ़ाया।
आधिकारिक जानकारी
डीबीएस महाविद्यालय के भूगर्भ विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रोफेसर दीपक भट्ट ने बताया कि वर्ष 1960 तक गोमुख ग्लेशियर की अंतिम टेल धराली क्षेत्र तक फैली हुई थी, लेकिन वर्ष 2025 तक यह लगभग 36 किलोमीटर पीछे खिसककर गोमुख क्षेत्र के आसपास सिमट गई है। उन्होंने कहा कि ग्लेशियर का यह सिकुड़ना धराली आपदा जैसे घटनाक्रमों से भी जुड़ा हुआ है।
वैज्ञानिक निष्कर्ष
अध्ययन में यह भी सामने आया है कि 13 से 14 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित हिमाच्छादित चोटियों में तापमान वृद्धि सबसे अधिक दर्ज की जा रही है। धराली गांव के ऊपर स्थित चोटी पर तेजी से पिघलते हिमखंड भविष्य में बड़े खतरे का संकेत दे रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार बर्फ विहीन होती चोटियां प्राकृतिक संतुलन को कमजोर कर रही हैं।
शोध का आधार
प्रोफेसर दीपक भट्ट ने वर्ष 1999 से 2001 तक गोमुख ग्लेशियर पर बतौर शोधार्थी तीन वर्षों तक अध्ययन किया था। हाल ही में धराली आपदा के बाद उन्होंने अपने विभाग के शोधार्थियों के साथ दोबारा इस शोध को आगे बढ़ाया है। वर्तमान में हर छह महीने में गंगोत्री ग्लेशियर पर एक नई अध्ययन रिपोर्ट तैयार की जा रही है।
राज्य के अन्य ग्लेशियर भी प्रभावित
गंगोत्री के अलावा उत्तराखंड के पिंडारी, मिलम, खतलिंग, बागिनी, कफनी, सुंदरढूंगा, रालम और नामिक जैसे प्रमुख ग्लेशियर भी वैश्विक तापमान वृद्धि से प्रभावित हो रहे हैं। प्रोफेसर भट्ट के अनुसार नदी घाटियों में खनन, जंगलों की कटाई और तेजी से हो रहा शहरीकरण इन ग्लेशियरों के लिए गंभीर खतरा बन चुका है।
आगे क्या होगा
वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि समय रहते ठोस पर्यावरणीय नीतियां लागू नहीं की गईं, तो हिमालयी क्षेत्रों में जल स्रोतों, आपदाओं और पारिस्थितिकी संतुलन पर गहरा असर पड़ेगा। शोध के निष्कर्ष नीति निर्धारण और आपदा प्रबंधन के लिए अहम साबित हो सकते हैं।





