
नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने देहरादून के चर्चित अनुपमा गुलाटी हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा काट रहे राजेश गुलाटी को किसी भी तरह की राहत देने से इनकार कर दिया है। राजेश गुलाटी की ओर से दायर अपील पर सुनवाई करते हुए वरिष्ठ न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति आलोक माहरा की खंडपीठ ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले में प्रस्तुत साक्ष्य, परिस्थितिजन्य प्रमाण और अपराध की गंभीरता को देखते हुए आजीवन कारावास की सजा उचित है। इस फैसले के साथ ही 15 वर्ष पुराने इस जघन्य हत्याकांड में न्यायिक प्रक्रिया अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
अनुपमा गुलाटी हत्याकांड वर्ष 2010 में सामने आया था, जिसने न केवल देहरादून बल्कि पूरे राज्य को झकझोर दिया था। यह मामला घरेलू विवाद से शुरू होकर एक जघन्य अपराध में बदल गया, जिसे अदालतों ने दुर्लभ और गंभीर श्रेणी का अपराध माना। निचली अदालत द्वारा दी गई सजा को 2017 में हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी, जिस पर अब अंतिम निर्णय आया है।
आधिकारिक जानकारी
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सुनवाई के बाद कहा कि निचली अदालत द्वारा दोष सिद्ध करने में कोई कानूनी त्रुटि नहीं पाई गई है। अदालत ने यह भी माना कि अभियोजन पक्ष ने मामले को ठोस साक्ष्यों के आधार पर सिद्ध किया है। इसलिए राजेश गुलाटी की आजीवन कारावास की सजा को यथावत रखा जाता है।
मामले का विवरण
राजेश गुलाटी पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और उसने वर्ष 1999 में अनुपमा से प्रेम विवाह किया था। विवाह के बाद दोनों अमेरिका चले गए थे, जहां अनुपमा गृहिणी थी। करीब छह वर्ष बाद दोनों भारत लौटे और देहरादून के प्रकाश नगर क्षेत्र में किराए के मकान में रहने लगे। पुलिस जांच में सामने आया था कि 17 अक्टूबर 2010 की रात पति-पत्नी के बीच विवाद हुआ, जिसमें अनुपमा बेहोश हो गई। इसके बाद राजेश ने पुलिस कार्रवाई के डर से उसकी हत्या कर दी।
स्थानीय / मानवीय पहलू
घटना के खुलासे के समय आसपास के लोगों और रिश्तेदारों में गहरा आघात देखा गया था। अनुपमा के भाई सुजान कुमार ने बहन की तलाश में देहरादून पहुंचकर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी, जिसके बाद यह पूरा मामला सामने आया। स्थानीय लोगों का कहना था कि यह घटना घरेलू हिंसा के गंभीर परिणामों की चेतावनी देती है।
आंकड़े / तथ्य
निचली अदालत ने 1 सितंबर 2017 को राजेश गुलाटी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसके साथ 15 लाख रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया था, जिसमें से 70 हजार रुपये राजकीय कोष में और शेष राशि बच्चों के बालिग होने तक बैंक में जमा कराने के आदेश दिए गए थे।
आगे क्या होगा
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद राजेश गुलाटी को आजीवन कारावास की सजा ही काटनी होगी। अब इस मामले में कानूनी रूप से केवल उच्चतम न्यायालय का विकल्प शेष रह जाता है, यदि दोषी वहां अपील करता है।





