
देहरादून: दुनिया की सबसे ऊंची और दुर्गम चोटियों में शामिल नंदा देवी पर्वत को लेकर एक बार फिर 60 साल पुराने अमेरिकी खुफिया मिशन की चर्चाएं तेज हो गई हैं। दावा किया जाता रहा है कि वर्ष 1965 में एक गोपनीय मिशन के दौरान अमेरिका का एक परमाणु उपकरण नंदा देवी पर छूट गया था। वर्ष 2021 की ऋषिगंगा आपदा के बाद इन कयासों ने नया जोर पकड़ा, हालांकि वैज्ञानिकों ने तब भी और अब भी स्पष्ट किया है कि किसी भी तरह के रेडिएशन से ग्लेशियर टूटने या आपदा आने का कोई प्रमाण नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला तथ्यों से अधिक अफवाहों पर आधारित है।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
नंदा देवी पर्वत को लेकर परमाणु उपकरण से जुड़ी चर्चाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं। वर्ष 2021 में चमोली जिले के ऋषिगंगा कैचमेंट क्षेत्र में आई जलप्रलय को वैज्ञानिकों ने हैंगिंग ग्लेशियर टूटने का परिणाम बताया था। इसके कुछ समय बाद यह अफवाह फैल गई कि ग्लेशियर का टूटना वर्ष 1965 में कथित रूप से छोड़े गए परमाणु उपकरण से निकले विकिरण का नतीजा है। अब एक बार फिर इस विषय पर बहस छिड़ गई है।
वैज्ञानिकों का पक्ष
उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (यूकास्ट) के पूर्व महानिदेशक डॉ. राजेंद्र डोभाल ने स्पष्ट किया कि 25 हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर ग्लेशियरों का तापमान माइनस 60 से 70 डिग्री सेल्सियस तक रहता है। ऐसे में किसी छोटे उपकरण से निकलने वाली ऊर्जा का ग्लेशियरों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता।
परमाणु ऊर्जा विशेषज्ञ और नेशनल फिजिकल लैबोरेटरी के पूर्व निदेशक डॉ. डीके असवाल ने भी कहा कि जिस उपकरण के होने की बातें की जाती हैं, वह इतना बड़ा नहीं था कि उसका विकिरण पर्यावरण, जलधाराओं या मानव स्वास्थ्य को प्रभावित कर सके। उनके अनुसार अब तक ऐसे किसी प्रभाव के ठोस वैज्ञानिक प्रमाण सामने नहीं आए हैं।
कथित अमेरिकी खुफिया मिशन क्या था
विभिन्न रिपोर्टों और चर्चाओं के अनुसार, अमेरिका ने भारत को विश्वास में लेकर वर्ष 1965 में नंदा देवी पर्वत पर एक खुफिया मिशन शुरू किया था। उस समय अमेरिका चीन के परमाणु परीक्षणों पर नजर रखना चाहता था। बताया जाता है कि इसके लिए प्लूटोनियम आधारित पोर्टेबल परमाणु जनरेटर एसएनपी-19सी स्थापित किया जाना था।
कहा जाता है कि खराब मौसम और विषम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण यह मिशन सफल नहीं हो सका और उपकरण वहीं छूट गया। हालांकि इस दावे से जुड़े कोई आधिकारिक या दस्तावेजी प्रमाण अब तक सामने नहीं आए हैं।
चमोली के पानी में यूरेनियम, प्लूटोनियम नहीं
डॉ. राजेंद्र डोभाल के अनुसार वर्ष 2005-06 में उत्तराखंड के जलस्रोतों की जांच की गई थी। इस दौरान चमोली जिले के पोखरी क्षेत्र के पानी में यूरेनियम पाया गया था, लेकिन कहीं भी प्लूटोनियम के प्रमाण नहीं मिले। उन्होंने स्पष्ट किया कि यूरेनियम प्राकृतिक रूप से चट्टानों में पाया जाता है और इसका परमाणु उपकरण से कोई सीधा संबंध नहीं है।
स्थानीय प्रतिक्रिया
स्थानीय लोगों और पर्यावरण से जुड़े जानकारों का कहना है कि हर बड़ी आपदा के बाद अफवाहें फैलना आम बात हो गई है। उनका मानना है कि बिना वैज्ञानिक आधार के ऐसी चर्चाएं लोगों में अनावश्यक भय पैदा करती हैं और वास्तविक कारणों पर ध्यान भटकाती हैं।
आगे क्या होगा
वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र में आपदाओं के पीछे जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों का पिघलना और भूगर्भीय कारण प्रमुख हैं। ऐसे में जरूरी है कि अफवाहों के बजाय वैज्ञानिक अनुसंधान और तथ्य आधारित निष्कर्षों पर भरोसा किया जाए।





