
विकासनगर (डाकपत्थर): होली के रंगीन त्योहार से पहले देहरादून जिले के विकासनगर क्षेत्र के डाकपत्थर में स्वयं सहायता समूह की महिलाएं हर्बल रंग तैयार करने में जुटी हुई हैं। बाजार में हर्बल रंगों की बढ़ती मांग को देखते हुए महिलाएं घर पर ही रोजगार से जुड़कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं। केमिकल रंगों के दुष्प्रभावों से बचने के लिए लोग अब प्राकृतिक और सुरक्षित विकल्पों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे इन महिलाओं के बनाए हर्बल रंगों की मांग लगातार बढ़ रही है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
होली को रंगों का त्योहार माना जाता है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत, ऋतु परिवर्तन और सामाजिक सद्भाव का प्रतीक है। इसी परंपरा को सुरक्षित और स्वास्थ्य के अनुकूल बनाने की दिशा में विकासनगर के डाकपत्थर क्षेत्र में वैभव लक्ष्मी स्वयं सहायता समूह की महिलाएं हर्बल रंगों का निर्माण कर रही हैं। यह समूह दस महिलाओं का है, जो पिछले कुछ वर्षों से इस कार्य से जुड़ा हुआ है।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया
कृषि विज्ञान केंद्र ढकरानी की वैज्ञानिक डॉ. किरन पंत ने बताया कि महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए लगातार रोजगार उन्मुखी कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि दो-तीन वर्ष पहले हर्बल रंगों से जुड़ा प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया गया था, जिसकी मांग अब पूरे क्षेत्र में तेजी से बढ़ रही है।
उनके अनुसार, पालक, चुकंदर, हल्दी और गुलाब जैसे प्राकृतिक तत्वों से रंग तैयार किए जाते हैं, जिनमें अरारोट मुख्य घटक होता है। अरारोट त्वचा के लिए सुरक्षित होता है और किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाता।
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स्थानीय प्रतिक्रिया
वैभव लक्ष्मी स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष संगीता वर्मा ने बताया कि बाजार में केमिकल रंगों की भरमार है, लेकिन लोग अब हर्बल रंगों को ज्यादा पसंद कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस होली के लिए अब तक करीब 50 किलो हर्बल रंगों की मांग आ चुकी है। महिलाओं का मानना है कि यह काम न केवल उन्हें आय का साधन दे रहा है, बल्कि पर्यावरण और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता भी बढ़ा रहा है।
आंकड़े और तथ्य
समूह ने पिछले वर्ष होली के दौरान लगभग एक क्विंटल हर्बल रंगों की मांग पूरी की थी। इस वर्ष भी होली में करीब एक महीना शेष रहते ही मांग आनी शुरू हो गई है। तैयार किए गए हर्बल रंगों को 50 ग्राम, 100 ग्राम और 250 ग्राम की पैकेजिंग में बाजार में उपलब्ध कराया जाएगा।
आगे क्या होगा
महिलाओं का कहना है कि यदि इसी तरह बाजार में हर्बल रंगों की मांग बनी रही, तो आने वाले समय में उत्पादन को और बढ़ाया जाएगा। कृषि विज्ञान केंद्र की मदद से नए समूहों को भी प्रशिक्षण देकर इस रोजगार को और विस्तार देने की योजना है।
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