
देहरादून: जंगल की आग की घटनाओं पर प्रभावी नियंत्रण के लिए उत्तराखंड वन विभाग ने तैयारियों को और सुदृढ़ करने की योजना बनाई है। प्रमुख वन संरक्षक (हाफ) आरके मिश्र ने स्पष्ट किया कि आग नियंत्रण एवं प्रबंधन के तहत फारेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया से प्राप्त फायर अलर्ट पर त्वरित और प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। इसके साथ ही फील्ड स्तर पर निगरानी, संसाधनों की उपलब्धता और जनभागीदारी को प्राथमिकता दी जा रही है। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि गर्मी के मौसम में वनाग्नि से वन संपदा, वन्यजीव और स्थानीय आबादी को बड़ा खतरा रहता है।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
पिछले वर्षों में प्रदेश के कई वन क्षेत्रों में जंगल की आग की घटनाएं सामने आती रही हैं। चीड़ बहुल इलाकों में पिरूल की अधिकता और शुष्क मौसम आग के खतरे को बढ़ाता है। इसी पृष्ठभूमि में वन विभाग ने आग से पहले की तैयारियों, त्वरित प्रतिक्रिया और समुदाय की भागीदारी पर जोर बढ़ाया है।
समीक्षा बैठक में क्या हुआ
गुरुवार को वन मुख्यालय के वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग कक्ष में वनाग्नि प्रबंधन और नियंत्रण की समीक्षा बैठक आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता प्रमुख मुख्य वन संरक्षक (हाफ) ने की। इसमें योजना एवं वित्तीय प्रबंधन, वन्यजीव, अग्नि एवं आपदा प्रबंधन, वन पंचायत, गढ़वाल और शिवालिक सहित देहरादून, चकराता और मसूरी के प्रभागीय वनाधिकारी भौतिक रूप से जुड़े, जबकि कुमाऊं मंडल सहित राज्यभर के अधिकारी ऑनलाइन माध्यम से शामिल हुए।
वनों की सुरक्षा का कवच
मुख्य वन संरक्षक सुशांत कुमार पटनायक ने बताया कि कंट्रोल बर्निंग, फायर लाइन मेंटेनेंस, चीड़-पिरूल के संग्रहण, पिरूल आधारित ब्रिकेट्स यूनिटों की स्थापना, आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता, ग्राम पंचायत स्तरीय अग्नि सुरक्षा समितियों और जन-जागरूकता कार्यक्रमों की प्रगति पर विस्तृत चर्चा हुई। मुख्यालय स्तर पर एकीकृत कमांड एंड कंट्रोल सेंटर के साथ 1926 इंटीग्रेटेड हेल्पलाइन नंबर भी क्रियाशील है।
चीड़-पिरूल प्रबंधन की स्थिति
चीड़-पिरूल एकत्रीकरण के लिए 48 कलेक्शन सेंटर स्थापित किए गए हैं। अगले दो वर्षों में 58 नए सेंटर स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। वर्तमान में नौ ब्रिकेट्स यूनिट कार्यरत हैं और आगामी दो वर्षों में 20 नई यूनिट स्थापित करने की योजना है। विश्व बैंक परियोजना के तहत अति संवेदनशील प्रभागों को पहले चरण में 500 पर्सनल प्रोटेक्टिव गियर किट्स उपलब्ध कराई गई हैं।
अधिकारियों के निर्देश
वन विभागाध्यक्ष (हाफ) ने निर्देश दिए कि सभी जिलों के फायर प्लान जिलाधिकारियों से अनुमोदित कराकर तत्काल प्रेषित किए जाएं। फील्ड स्तर पर प्रस्तावित कंट्रोल बर्निंग और फायर लाइन मेंटेनेंस को प्राथमिकता से पूरा किया जाए। उद्योग विभाग से समन्वय बढ़ाकर पिरूल के फारवर्ड लिंकज मजबूत करने और सभी क्रू स्टेशनों पर उपकरण व मानव संसाधन सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया गया।
स्थानीय सहभागिता
जंगल की आग के दौरान ग्राम पंचायतों और स्थानीय समुदायों की भूमिका को अहम माना गया है। अधिक से अधिक जन-जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने और स्वयंसेवकों को जोड़ने पर बल दिया गया, ताकि शुरुआती स्तर पर ही आग पर काबू पाया जा सके।
सुरक्षा प्रबंधन के प्रमुख बिंदु
एफएसआइ फायर अलर्ट पर तत्काल रिस्पांस और फीडबैक को अनिवार्य किया गया है। राज्यभर में 1438 क्रू स्टेशन, 40 कंट्रोल रूम और 174 वॉच टावर के माध्यम से निगरानी मजबूत की गई है। 1926 हेल्पलाइन के साथ एकीकृत कमांड एंड कंट्रोल सेंटर सक्रिय है। चीड़-पिरूल संग्रहण के 48 सेंटर चालू हैं और 58 नए सेंटर का लक्ष्य तय किया गया है। पिरूल आधारित नौ यूनिट कार्यरत हैं और 20 नई यूनिट प्रस्तावित हैं। अति संवेदनशील प्रभागों को 500 पीपीई किट्स उपलब्ध कराई गई हैं।
आगे क्या होगा
आग के मौसम से पहले सभी तैयारियों को धरातल पर उतारने का लक्ष्य रखा गया है। विभाग का दावा है कि त्वरित अलर्ट, मजबूत निगरानी और स्थानीय सहभागिता के माध्यम से जंगल की आग की घटनाओं को न्यूनतम किया जाएगा।






