
देहरादून: उत्तराखंड राज्य स्थापना की रजत जयंती समारोहों के बीच एक आरटीआई के खुलासे ने सरकार की तैयारी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। राज्य गठन के 25 वर्ष बीत जाने के बाद भी उत्तराखंड अब तक अपनी आपदा प्रबंधन नीति नहीं बना पाया है। केदारनाथ, जोशीमठ और हालिया धराली जैसी आपदाओं से गुजरने के बावजूद यह तथ्य चिंताजनक है कि राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA) अब भी “विचाराधीन नीति” के सहारे चल रहा है।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
साल 2000 में बने उत्तराखंड की पहचान पहाड़ी आपदाओं के लिए भी रही है। 2013 की केदारनाथ त्रासदी, 2021 की रैणी आपदा और हाल की सिल्क्यारा टनल घटना ने बार-बार सरकार को चेताया है कि हिमालयी राज्य में एक ठोस आपदा नीति की आवश्यकता कितनी जरूरी है। बावजूद इसके, 25 साल बाद भी राज्य के पास कोई स्पष्ट और लागू आपदा प्रबंधन नीति नहीं है।
आरटीआई में बड़ा खुलासा
समाजसेवी अनूप नौटियाल द्वारा दाखिल एक आरटीआई में राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA) ने जवाब दिया है कि “उत्तराखंड में इस समय किसी भी प्रकार की आपदा प्रबंधन नीति लागू नहीं है।” विभाग ने यह भी बताया कि नीति “विचाराधीन” है।
वहीं, उत्तराखंड स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट प्लान का पहला संस्करण 2014 में, और दूसरा 2020–21 में प्रकाशित हुआ था — लेकिन नीति अब तक अधर में है।
सरकारी प्रतिक्रिया
जब इस विषय पर आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन से संपर्क किया गया तो उन्होंने इस पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया।
अधिकारियों का कहना है कि नीति पर काम चल रहा है, लेकिन अभी तक अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है।
स्थानीय दृष्टिकोण
देहरादून के एक स्थानीय व्यापारी ने कहा, “हर बार आपदा आने के बाद सरकार जागती है, लेकिन ठोस नीति कभी नहीं बन पाती। इससे राहत कार्यों में देरी होती है।”
वहीं, ग्रामीणों का कहना है कि “जब तक आपदा प्रबंधन विभाग में स्थाई और प्रशिक्षित कर्मचारी नहीं होंगे, तब तक कोई भी नीति ज़मीन पर असर नहीं दिखा पाएगी।”
संरचना और संसाधन
उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA) एक छोटे कमरे से अब देहरादून आईटी पार्क में 87 करोड़ रुपये की बहुमंजिला इमारत तक पहुंच गया है। आधुनिक उपकरणों की खरीद के लिए 53 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बजट भी रखा गया है। फिर भी, विभाग की तस्वीर स्याह है — 80% कर्मचारी आज भी कॉन्ट्रैक्ट पर हैं, स्थायी नियुक्तियां नहीं हुई हैं।
विशेषज्ञ की राय
पूर्व सीईओ डॉ. पीयूष रौतेला का कहना है —
“उपकरण और संसाधन कितने भी महंगे क्यों न हों, यदि उन्हें संचालित करने वाला व्यक्ति प्रशिक्षित और कुशल नहीं है, तो सारी मेहनत व्यर्थ हो जाती है।”
राजनीतिक प्रतिक्रिया
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भाजपा सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा —
“हमारे शासनकाल में आपदा प्रबंधन नीति पर काफी काम हो चुका था। जब सत्ता सौंपी, उस समय नीति लगभग तैयार थी। यदि यह अब तक लागू नहीं हुई, तो यह वर्तमान सरकार की जिम्मेदारी है।”
आगे क्या होगा
सूत्रों के अनुसार, सरकार अब राज्य की आपदा प्रबंधन नीति को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में है। बताया जा रहा है कि आने वाले महीनों में नीति का प्रारूप सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी किया जा सकता है। हालांकि, अधिकारी इस पर फिलहाल स्पष्ट समयसीमा बताने से बच रहे हैं।




