
देहरादून। भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा किए गए एक विशेष अध्ययन में बाघिन के व्यवहार से जुड़ी कई रोचक और महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आई हैं। अध्ययन में पाया गया कि एक बाघिन पूरे दिन में आधे से भी अधिक समय आराम करती है और उसकी गतिविधियां मौसम के अनुसार बदलती रहती हैं। यह शोध न केवल बाघों के व्यवहार को समझने में मददगार है, बल्कि इससे मानव–वन्यजीव संघर्ष को कम करने की रणनीतियां बनाने में भी अहम भूमिका निभाई जा सकेगी।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
भारत में बाघ संरक्षण के प्रयासों के बीच उनके व्यवहार और गतिविधियों को वैज्ञानिक दृष्टि से समझना बेहद जरूरी माना जाता है। अक्सर बाघों की आवाजाही और मानव बस्तियों के बीच टकराव को लेकर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में आधुनिक तकनीक के माध्यम से किया गया यह अध्ययन वन्यजीव प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
आधिकारिक जानकारी
भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिकों ने महाराष्ट्र के ब्रहमपुरी वन प्रभाग में एक बाघिन पर जीपीएस कॉलर के साथ एक्टिविटी सेंसर लगाया। इस सेंसर के जरिए शरीर की गतिविधियों, मूवमेंट और शारीरिक संकेतों को ट्रैक किया गया। इसके साथ ही कैमरा ट्रैप और प्रत्यक्ष अवलोकन के माध्यम से भी बाघिन की गतिविधियों पर लगातार 10 माह तक नजर रखी गई।
विशेषज्ञ की बात
अध्ययन से जुड़े संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. बिलाल हबीब ने बताया कि पहली बार किसी बाघिन पर एक्टिविटी सेंसर (एक्सेलेरोमीटर) लगाकर उसकी चाल, आराम, शिकार और लंबी दूरी की यात्रा जैसी गतिविधियों से जुड़ा विस्तृत डेटा एकत्र किया गया है। यह शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन जर्नल में भी प्रकाशित हुआ है। उनके अनुसार इस जानकारी से बाघिन के व्यवहार को बेहतर ढंग से समझते हुए मानव–वन्यजीव संघर्ष को कम करने की योजनाएं बनाई जा सकेंगी।
आंकड़े / निष्कर्ष
अध्ययन में सामने आया कि बाघिन दिन का करीब 65 प्रतिशत समय आराम करने में बिताती है, जिसे वैज्ञानिक कठिन परिस्थितियों में ऊर्जा बचाने की रणनीति मानते हैं। लगभग 20 प्रतिशत समय वह यात्रा में रहती है। शोध के अनुसार बाघिन लंबी दूरी की यात्रा मुख्य रूप से शाम के समय करती है। मौसम के आधार पर भी उसकी सक्रियता बदलती रहती है—गर्मी और सर्दी में वह सुबह और शाम अधिक सक्रिय रहती है, जबकि मानसून के दौरान शाम के समय उसकी गतिविधि अपेक्षाकृत बढ़ जाती है।
आगे क्या
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह के अध्ययन भविष्य में अन्य बाघ क्षेत्रों में भी किए जा सकते हैं। इससे बाघों की आवाजाही के पैटर्न को समझकर संवेदनशील इलाकों में समय रहते प्रबंधन उपाय किए जा सकेंगे और मानव–वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं को कम करने में मदद मिलेगी।






