
देहरादून: उत्तराखंड में राजकीय शिक्षक संघ के प्रांतीय कार्यकारिणी चुनाव की प्रक्रिया में बड़ा बदलाव संभव है। प्रदेश के शिक्षकों को सीधे मतदान का अधिकार मिल सकता है। इस संबंध में हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद माध्यमिक शिक्षा निदेशालय ने शासन को प्रस्ताव भेज दिया है। प्रस्ताव में कहा गया है कि मामले में शासन स्तर पर अंतिम निर्णय लिया जाना आवश्यक है, ताकि याचिकाकर्ता के प्रत्यावेदन का समयबद्ध निस्तारण किया जा सके। यदि प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है, तो शिक्षक संघ की चुनावी व्यवस्था में यह एक अहम सुधार माना जाएगा।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
वर्तमान में राजकीय शिक्षक संघ के चुनाव प्रतिनिधि प्रणाली के तहत कराए जाते हैं। यानी सभी शिक्षक सीधे मतदान नहीं करते, बल्कि विद्यालयों से चुने गए प्रतिनिधि मतदान करते हैं। इसी व्यवस्था को चुनौती देते हुए शिक्षक अंकित जोशी ने उत्तराखंड हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया कि संघ के संविधान में प्रतिनिधियों के चयन की प्रक्रिया स्पष्ट नहीं है।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया
मामले में माध्यमिक शिक्षा निदेशक डॉ. मुकुल कुमार सती ने शासन को भेजे पत्र में कहा है कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद यह आवश्यक हो गया है कि शासन स्तर से अंतिम निर्णय लिया जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि शासन के निर्णय के बाद ही याचिकाकर्ता के प्रत्यावेदन का निस्तारण किया जा सकेगा।
स्थानीय प्रतिक्रिया
शिक्षकों का कहना है कि मौजूदा प्रतिनिधि प्रणाली में सभी शिक्षकों की समान भागीदारी सुनिश्चित नहीं हो पाती। कई शिक्षक इसे गुटीय नियंत्रण और पारदर्शिता की कमी से जोड़कर देखते हैं। शिक्षकों का मानना है कि यदि सभी को सीधे मतदान का अधिकार मिलता है, तो संघ अधिक लोकतांत्रिक और जवाबदेह बन सकेगा।
आंकड़े और तथ्य
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि संघ के संविधान के अनुसार
1 से 10 शिक्षकों वाले विद्यालय में 1 प्रतिनिधि,
11 से 20 शिक्षकों वाले विद्यालय में 2 प्रतिनिधि,
और 21 से 30 शिक्षकों वाले विद्यालय में 3 प्रतिनिधि तय किए जाते हैं।
हालांकि, संविधान में यह स्पष्ट नहीं है कि इन प्रतिनिधियों का चयन प्रत्यक्ष मतदान से होगा या नामांकन के जरिए, जिसे याचिकाकर्ता ने लोकतांत्रिक दृष्टि से अनुचित बताया है।
आगे क्या होगा
याचिकाकर्ता ने मांग की है कि शिक्षक संघ के संविधान में आवश्यक संशोधन किए जाने के बाद ही प्रांतीय कार्यकारिणी के चुनाव कराए जाएं। अब शासन के फैसले पर सबकी नजरें टिकी हैं। यदि शासन सीधे मतदान के पक्ष में निर्णय लेता है, तो आगामी चुनाव प्रक्रिया पूरी तरह बदल सकती है।
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