
ऋषिकेश: तपोवन–लक्ष्मणझूला क्षेत्र में स्कूटी–बाइक रेंटल देने वाले संचालक इन दिनों बड़ी दिक्कतों से गुजर रहे हैं। एक ओर पर्यटकों की लापरवाही से उन पर लगातार भारी चालान थोपे जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर परिवहन विभाग के प्रस्ताव के बाद चर्चाएँ तेज हैं कि भविष्य में नियम उल्लंघन की स्थिति में वाहन मालिकों को सामाजिक सेवा जैसे लंगर वितरण, सफाई या रक्तदान भी करना पड़ सकता है। इससे रेंटल एजेंसियों में भय और असमंजस का माहौल है।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
पिछले कुछ वर्षों में ऋषिकेश, खासकर तपोवन और लक्ष्मणझूला क्षेत्र में रेंटल स्कूटी–बाइक सेवा तेज़ी से बढ़ी है। रोजाना हजारों पर्यटक यहां पहुंचकर दोपहिया किराये पर लेते हैं। लेकिन एएनपीआर कैमरों के सक्रिय होने के बाद से वाहन मालिकों को भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है।
पर्यटक अक्सर हेलमेट नहीं पहनते, ओवरलोडिंग करते हैं या ट्रैफिक नियमों की अनदेखी करते हैं। इनके जाने के बाद चालान एजेंसी मालिकों के मोबाइल पर आता है और रकम कई बार हजारों में पहुंच जाती है।
आधिकारिक जानकारी
ब्रह्मपुरी और भद्रकाली चेक पोस्ट पर लगे एएनपीआर कैमरे नियम उल्लंघन को तुरंत रिकॉर्ड कर चालान जारी कर देते हैं। कैमरों का उद्देश्य चारधाम यात्रा और प्रमुख मार्गों पर सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना है।
परिवहन विभाग का कहना है कि नियम तोड़ने वाले पर्यटक हों या स्थानीय लोग—प्रक्रिया एक समान है। लेकिन रेंटल वाहन एजेंसियों का कहना है कि चालान हमेशा वाहन मालिक के नाम पर आते हैं और पर्यटक का पता लगाना लगभग असंभव हो जाता है।
स्थानीय प्रतिक्रिया
तपोवन क्षेत्र के कई रेंटल संचालकों ने बताया कि मौजूदा समय में वे पहले ही घाटे से जूझ रहे हैं। यदि भविष्य में प्रस्तावित सामाजिक सेवा दंड लागू होता है, तो उनका काम और कठिन हो जाएगा।
एक संचालक ने बताया कि “400 रुपये की स्कूटी किराये पर देने के बाद भी कई बार 2000 से 5000 रुपये तक का चालान हमारी जेब से भरना पड़ता है। अब यदि इसके बाद सामाजिक सेवा भी करनी पड़ेगी, तो यह व्यवसाय चलाना मुश्किल हो जाएगा।”
कई एजेंसी मालिकों ने यह भी कहा कि वे हर पर्यटक को नियम समझाते हैं और हेलमेट भी देते हैं, लेकिन उल्लंघन फिर भी होता है। कुछ लोग चाहते हैं कि रेंटल वाहनों के लिए अलग पंजीकरण नंबर या डिजिटल पहचान जारी हो, ताकि चालान सीधे पर्यटक तक पहुंच सके।
संभावित असर
यदि परिवहन विभाग का सामाजिक सेवा वाला प्रस्ताव लागू होता है, तो वाहन मालिकों को चालान के साथ–साथ सामुदायिक सेवा भी करनी होगी। बार-बार उल्लंघन होने पर लंगर लगाना, रक्तदान और अन्य सामाजिक कार्यों की जिम्मेदारी भी आ सकती है।
रेंटल व्यवसायियों का कहना है कि दोष पर्यटक करते हैं लेकिन सजा एजेंसी को मिलती है। इसलिए इस नीति को लागू करने से पहले किराया वाहन प्रणाली में अलग ढांचा बनाना जरूरी है।
आगे क्या?
प्रस्ताव फिलहाल शासन स्तर पर विचाराधीन है। रेंटल एजेंसी संचालक उम्मीद कर रहे हैं कि नई नीति बनाते समय उनके सुझावों को गंभीरता से सुना जाएगा। इस विषय पर स्थानीय प्रशासन, परिवहन विभाग और रेंटल यूनियनों के बीच चर्चा की तैयारी भी की जा रही है।
संचालकों का कहना है कि अगर व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ, तो ऋषिकेश जैसे पर्यटन केंद्र में रेंटल व्यवसाय पर बड़ा असर पड़ेगा।







