
रामनगर: उत्तराखंड राज्य गठित हुए 25 साल बीत चुके हैं, लेकिन कुमाऊं और गढ़वाल को सीधे जोड़ने वाले ऐतिहासिक कंडी मार्ग का निर्माण अब भी पूरा नहीं हो पाया है। लगभग 200 साल पुरानी यह सड़क कभी सब-माउंटेन रोड के नाम से जानी जाती थी और पहाड़ की पहचान मानी जाती थी। अब सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देशों ने इस मार्ग के भविष्य को लेकर एक नई उम्मीद पैदा की है।
क्यों महत्वपूर्ण है कंडी मार्ग
कंडी मार्ग कभी पहाड़ और मैदानी क्षेत्र की सीमा रेखा के रूप में जाना जाता था। ब्रिटिश शासन में इस मार्ग के ऊपर तैनात कर्मचारियों को पर्वतीय भत्ता दिया जाता था, वहीं नीचे वाले कर्मचारी इससे वंचित रहते थे। वर्षों से स्थानीय लोग इसे दोबारा शुरू करने की मांग करते रहे, लेकिन सरकारें इसे केवल चुनावी मंचों पर उठाती रहीं। वास्तविकता यह है कि किसी सरकार ने इस परियोजना को प्राथमिकता नहीं दी और फाइलें आगे बढ़ ही नहीं पाईं।
कॉर्बेट रिजर्व में फंसा विवाद
रामनगर से कोटद्वार तक फैले इस मार्ग का लगभग 43 किलोमीटर हिस्सा कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के भीतर आता है। 1999 में केंद्र सरकार ने आम लोगों के लिए मार्ग खोलने की अनुमति दी थी, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के चलते यहां बस सेवा भी बंद कर दी गई। राज्य बनने के बाद सरकार ने इसे ऑल वेदर रोड के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव भी भेजा, लेकिन कई एनजीओ ने इसे वन्यजीवों के लिए खतरा बताते हुए अदालत में चुनौती दे दी। मामला अदालतों में उलझ गया और पैरवी मजबूत न होने से प्रोजेक्ट वर्षों से अटका हुआ है।
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक डॉ. साकेत बडोला का कहना है कि कंडी मार्ग का मामला विभिन्न अदालतों में विचाराधीन है और अदालत के निर्णयों के अनुसार ही आगे की कार्रवाई की जाएगी।
अधूरी पहलें और नेताओं की घोषणाएँ
समय-समय पर कई नेताओं ने कंडी मार्ग के निर्माण को आगे बढ़ाने की बातें कहीं—चाहे पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी हों या त्रिवेंद्र सिंह रावत, पूर्व सांसद तीरथ सिंह रावत हों या राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी। कई सर्वे हुए, प्रस्ताव बने, बैठकें हुईं, लेकिन परियोजना कागजों से बाहर ही नहीं आ पाई।
लोगों की परेशानियाँ और सामरिक महत्व
मार्ग बंद होने की वजह से रामनगर से कोटद्वार जाने वाले लोगों को नजीबाबाद होकर लंबा चक्कर लगाना पड़ता है। दूरी 165 किलोमीटर तक बढ़ जाती है, जबकि कंडी मार्ग बनने पर यही दूरी 88 किलोमीटर रह जाएगी। इससे न सिर्फ समय और ईंधन की बचत होगी, बल्कि व्यापार, पर्यटन और सांस्कृतिक जुड़ाव भी मजबूत होगा।
इस मार्ग का सामरिक महत्व भी कम नहीं है। लैंसडाउन स्थित गढ़वाल रेजिमेंट सेंटर और रानीखेत स्थित कुमाऊं रेजिमेंट मुख्यालय को जोड़ने के लिए यह सबसे सीधा और तेज मार्ग माना जाता है।
संघर्ष समिति का संघर्ष और अदालतों की यात्रा
कंडी मार्ग निर्माण संघर्ष समिति के अध्यक्ष पीसी जोशी बताते हैं कि वर्ष 2005 में वे इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट गए थे, जहां से उन्हें हाईकोर्ट में जाने को कहा गया। 2010 में हाईकोर्ट ने निर्माण पर सहमति भी दी, लेकिन 2014 में जब वे फिर अदालत पहुंचे, तो दो दर्जन से अधिक एनजीओ उनके विरोध में खड़े हो गए। मजबूरन उन्हें अपनी याचिका वापस लेनी पड़ी। जोशी का कहना है कि पर्यावरण के नाम पर रोक लगाने वाले बहुत हैं, लेकिन जनता की आवाज उठाने वाला तंत्र कमजोर पड़ जाता है।
सुप्रीम कोर्ट का नया आदेश — उम्मीद की किरण
17 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी राष्ट्रीय उद्यानों के लिए एक समान नीति बनाने और स्थानीय लोगों के हितों को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए हैं। पीसी जोशी का मानना है कि यह फैसला कंडी मार्ग के लिए महत्वपूर्ण अवसर है। उनके अनुसार स्पष्ट नीति आने के बाद टाइगर रिजर्व और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में विकास कार्यों के लिए दिशा तय हो सकेगी और कंडी मार्ग की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।
आगे की तैयारी
संघर्ष समिति अब कुमाऊं और गढ़वाल के आंदोलनकारियों की संयुक्त बैठक बुलाने की तैयारी कर रही है। उनका उद्देश्य है कि सरकार पर दबाव बनाया जाए ताकि कंडी मार्ग को प्राथमिकता पर लेकर ठोस कदम उठाए जाएं।





