
धर्म डेस्क: छह महीने तक चली सूर्य की दक्षिणायन यात्रा अब समाप्त होने जा रही है। 14 जनवरी से सूर्यदेव उत्तर दिशा की यात्रा प्रारंभ करेंगे, जिसे उत्तरायण कहा जाता है। इसी के साथ उत्तरायणी पर्वों की शुरुआत हो जाएगी और माघ मास के लगते ही विवाह सहित सभी मांगलिक कार्यों पर लगा विराम भी समाप्त हो जाएगा। धार्मिक दृष्टि से यह समय वर्ष के सबसे शुभ कालों में से एक माना जाता है।
पंचांग के अनुसार 14 जनवरी को सूर्योदय से सूर्यास्त तक मकर संक्रांति का पर्वकाल रहेगा। इसी दिन से गुड़-तिल से जुड़े पर्वों की श्रृंखला भी आरंभ हो जाएगी। ऋतु परिवर्तन के इस विशेष पर्व पर हेमंत ऋतु विदा लेती है और शिशिर ऋतु का आगमन माना जाता है, जिससे मौसम और दिनचर्या में भी बदलाव दिखने लगता है।
सूर्य का मकर राशि में प्रवेश और उत्तरायण की शुरुआत
बुधवार को माघ कृष्ण एकादशी के दिन सूर्यनारायण अनुराधा नक्षत्र में धनु राशि को त्यागकर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। शास्त्रों में मान्यता है कि सूर्य के मकरस्थ होते ही ठंड तिल-तिल घटने लगती है, और इसी के साथ गुड़-तिल के पर्व प्रारंभ हो जाते हैं।
उत्तरायण होने पर सूर्य दक्षिण-पूर्व दिशा से उत्तर दिशा की ओर बढ़ना शुरू करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह काल देवताओं के लिए दिन के समान होता है, इसलिए इसे अत्यंत शुभ माना गया है। हालांकि, मौसम विज्ञान के अनुसार 31 दिसंबर से शुरू हुआ कड़ाके की ठंड का 40 दिनों का “चिल्ला” अभी 8 फरवरी तक प्रभावी रहेगा।
गुड़-तिल के पर्वों की श्रृंखला होगी शुरू
मकर संक्रांति के साथ ही कई प्रमुख पर्वों की शुरुआत होती है। इनमें लोहड़ी, सकट चौथ, षट्तिला एकादशी, वसंत पंचमी और मौनी अमावस्या जैसे पर्व शामिल हैं। इन सभी पर्वों में तिल, गुड़ और दान का विशेष महत्व बताया गया है।
उत्तर भारत के गांगेय क्षेत्रों में यह समय स्नान पर्वों के रूप में मनाया जाता है, जबकि पर्वतीय राज्यों में उत्तरायणी पर्व का विशेष उत्साह देखने को मिलता है। ऋषिकेश और आसपास के क्षेत्रों में भी गंगा स्नान और दान-पुण्य का विशेष महत्व रहता है।
मकर संक्रांति के अलग-अलग नाम और परंपराएं
मकर संक्रांति भारत के हर राज्य में अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाई जाती है। महाराष्ट्र में इसे गुड़ी पड़वा, असम में बिहू और दक्षिण भारत में ओणम के रूप में जाना जाता है। पंजाब में लोहड़ी का पर्व गुड़, तिल, मूंगफली और अग्नि पूजा से जुड़ा हुआ है।
गुरुकुल परंपरा में मकर संक्रांति के दिन विद्यासत्र आरंभ किए जाते थे। इस अवसर पर घरों में उड़द की दाल और चावल से बनी खिचड़ी पकाई जाती है और दान भी की जाती है, जिसे पुण्यदायी माना गया है।
देवताओं का प्रभात काल मानी जाती है मकर संक्रांति
शास्त्रों के अनुसार मकर संक्रांति देवताओं का प्रभात काल है, जो लगभग मध्य जुलाई तक रहता है। इसके बाद छह महीने का दक्षिणायन काल शुरू होता है। महाभारत काल में भी इस तिथि का विशेष महत्व बताया गया है। भीष्म पितामह ने भी उत्तरायणी की प्रतीक्षा करते हुए इसी शुभ काल में अपने महाप्रयाण का वरण किया था।
मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि ऋतु परिवर्तन, सूर्य की गति और आध्यात्मिक विश्वासों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण अवसर है। उत्तरायण के साथ शुभ कार्यों की शुरुआत, दान-पुण्य और पर्वों की श्रृंखला जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। ऋषिकेश सहित पूरे देश में यह पर्व आस्था, परंपरा और सामाजिक एकता का प्रतीक बनकर मनाया जाता है।







