त्यूणी: जौनसार बावर क्षेत्र में जनवरी माह के साथ ही पारंपरिक पौष त्यौहार और माघ मरोज के लोक उत्सव का आगाज 9 जनवरी से होने जा रहा है। 39 खतों में मनाए जाने वाले इस पर्व की शुरुआत हनोल के समीप कयलू महाराज मंदिर में चुराच चढ़ाने की परंपरा से होगी, जिसके बाद 10 जनवरी को किसराट का त्यौहार परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाएगा। इस लोक उत्सव के चलते पूरे क्षेत्र में लगभग एक माह तक मेहमाननवाजी, लोक नृत्य और सांस्कृतिक गतिविधियों का दौर चलेगा, जिससे पंचायती आंगन गुलजार रहेंगे।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
जौनसार बावर में पौष त्यौहार और माघ मरोज का विशेष सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व टोंस नदी क्षेत्र में किरमिर नामक नरभक्षी राक्षस का आतंक था, जिसे मानव कल्याण के लिए महासू देवता ने वध किया। इसी विजय और खुशहाली की स्मृति में क्षेत्र के लोग प्रतिवर्ष पौष मास की 26 गते को इस लोक उत्सव को परंपरागत रूप से मनाते हैं। यह पर्व सामाजिक एकता और सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक माना जाता है।
आधिकारिक जानकारी
कयलू महाराज मंदिर के पुरोहित मोहनलाल सेमवाल के अनुसार इस वर्ष 9 जनवरी को चुराच की रस्म अदा की जाएगी। इसके अगले दिन 10 जनवरी को बावर-देवघार क्षेत्र की 11 खतों में किसराट का पर्व मनाया जाएगा। जौनसार बावर की 39 खतों से जुड़े 363 राजस्व गांवों में इस दौरान परंपरागत रीति से आयोजन होते हैं और लोग अपने-अपने घरों में मेहमानों का स्वागत करते हैं।
स्थानीय प्रतिक्रिया
स्थानीय लोगों का कहना है कि पौष त्यौहार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द का पर्व है। नौकरी-पेशा लोग भी इस अवसर पर अपने पैतृक गांव लौटते हैं और रिश्तेदारों व मित्रों के साथ उत्सव मनाते हैं। ग्रामीणों के अनुसार यह पर्व संयुक्त परिवार और आपसी भाईचारे की भावना को मजबूत करता है।
आंकड़े / तथ्य
जौनसार बावर की 39 खतों और 363 राजस्व गांवों में यह पर्व मनाया जाता है। बकरों की कीमत इस बार 20 हजार से 50 हजार रुपये तक पहुंच गई है। किसराट पर्व 10 जनवरी को 11 खतों में आयोजित होगा।
पौष पर्व पर मेहमाननवाजी की परंपरा
पौष त्यौहार के दौरान घरों में विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं। सुबह पहाड़ी लाल चावल के साथ उड़द की खिचड़ी, जिसे स्थानीय रूप से मशयाड़ा भात कहा जाता है, परोसी जाती है। इसे अखरोट, भंगजीरा और पोस्त दाने के मसाले के साथ घी व तिल की चटनी के साथ खाया जाता है। रात्रि भोज में बकरे का मांस, लाल चावल और रोटी परोसने की परंपरा है। मामा के लिए सहभोज में बकरे की जिकुड़ी परोसना भी इस पर्व की विशेष परंपरा मानी जाती है।
बकरों की बढ़ी मांग
लोक उत्सव के चलते क्षेत्र में बकरों की मांग तेजी से बढ़ी है। मवेशी पालन का दायरा सिमटने के कारण कीमतों में भारी उछाल देखा जा रहा है। कालसी, अंबाड़ी, बाडवाला, विकासनगर और देहरादून की मंडियों में बकरों की खरीदारी के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। लोक मान्यता के अनुसार कयलू महाराज मंदिर में चढ़ाए जाने वाले चुराच के बकरे के मांस का आधा हिस्सा टोंस नदी में किरमिर राक्षस के नाम से अर्पित किया जाता है, ताकि क्षेत्र में किसी प्रकार का अनिष्ट न हो।
आगे क्या होगा
9 जनवरी को चुराच और 10 जनवरी को किसराट के साथ ही पूरे क्षेत्र में एक माह तक लोक उत्सव का सिलसिला चलेगा। पंचायती आंगनों में लोक नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होंगे, जबकि गांव-गांव में मेहमाननवाजी का दौर जारी रहेगा।
