
विकासनगर: जौनसार-बावर क्षेत्र में सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार मनाई जाने वाली पाँच दिवसीय बूढ़ी दीवाली रविवार को हाथी और हिरण नृत्य के साथ संपन्न हो गई। इन पाँच दिनों में गांव के पंचायती आंगन लोकगीतों, मशालों और पारंपरिक नृत्यों से गुलजार रहे। नौकरी-पेशा लोग भी अपने पैतृक गांव लौटकर इस विशेष पर्व में शामिल हुए।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
जौनसार-बावर में दीवाली देशभर की दीवाली के एक महीने बाद मनाई जाती है। कहा जाता है कि यह पर्व प्राचीन ऋतु परिवर्तन और कृषि चक्र से जुड़ी सांस्कृतिक परंपराओं का हिस्सा रहा है। पांच दिनों तक चलने वाले इस पर्व में लोकगीतों, सामूहिक नृत्यों और मशाल जुलूस की विशिष्ट परंपराएँ शामिल हैं, जिनके कारण यह पर्व क्षेत्र की पहचान बन चुका है।
आधिकारिक जानकारी
पाँच दिवसीय बूढ़ी दीवाली की शुरुआत छोटी होलियात से होती है, जबकि अमावस्या को बड़ी होलियात मनाई जाती है। ग्रामीण भीमल की पतली लकड़ियों से बनी मशालें जलाकर इष्ट देवता को स्मरण करते हुए पंचायती आंगन में एकत्र होते हैं और वाद्य-यंत्रों की थाप पर सामूहिक नृत्य करते हैं। इसके बाद भीरुड़ी पर्व मनाया जाता है, जिसमें गांव का स्याणा ऊँचे स्थान से अखरोट बिखेरता है। ग्रामीण इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। इसके अलावा चिवड़ा और अखरोट पहले इष्ट देवता को अर्पित किए जाते हैं। रात में पंचायती आंगन में हास्य कलाकारों का कार्यक्रम भी होता है, जो ग्रामीणों के मनोरंजन का प्रमुख हिस्सा है।
पाँचवें दिन पारंपरिक काठ का हाथी और हिरण नृत्य प्रमुख आकर्षण रहे। जौनसार के कोरूवा गांव में महिलाओं और पुरुषों ने जौनसारी वेशभूषा में हारूल, तांदी और झैंता नृत्य प्रस्तुत किया। इसके बाद हिरण नृत्य का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे।
अधिकारियों की ओर से औपचारिक टिप्पणी नहीं की गई, लेकिन स्थानीय सांस्कृतिक संस्थाओं ने आयोजन को सफल बताया।
स्थानीय प्रतिक्रिया
स्थानीय लोगों का कहना है कि पारंपरिक त्योहारों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने से युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति को गहराई से समझ पाती है। कई ग्रामीणों ने बताया कि बूढ़ी दीवाली क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान है, जिसे आगे भी इसी उत्साह से मनाया जाना चाहिए। कोरूवा गांव के पूर्व सीबीएसई सचिव रणवीर सिंह तोमर ने कहा कि पांच दिनों तक चलने वाला यह पर्व जौनसार-बावर की सांस्कृतिक आत्मा को जीवित रखता है और हर दिन अलग-अलग लोकगीत तथा नृत्य इसकी सुंदरता को और बढ़ाते हैं।
आगे क्या
समारोह के समापन के बाद अब लोग अपने-अपने कामों पर लौटने लगे हैं। स्थानीय संगठनों ने आने वाले वर्ष के कार्यक्रमों की तैयारी जल्द शुरू करने की बात कही है, ताकि आने वाली पीढ़ियों को भी इस परंपरा से जोड़ा जा सके।







