
देहरादून: उत्तराखंड की राजधानी दून के दूरस्थ क्षेत्र बाड़वाला स्थित जगतग्राम में चल रही पुरातात्विक खुदाई से अश्वमेघ यज्ञ से जुड़े नए राज सामने आने लगे हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को प्रारंभिक सफलता के तौर पर जमीन के भीतर दबे प्राचीन मृदभांड, घड़े और ईंटें मिली हैं। अब इन अवशेषों की सटीक अवधि तय करने के लिए टीएल (थर्मोल्यूमिनेसेंस) और ओएसएल (आप्टिकली स्टिम्युलेटेड ल्यूमिनेसेंस) डेटिंग कराने का निर्णय लिया गया है। इसके लिए वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान से समन्वय किया गया है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
एएसआई उत्तराखंड सर्किल के अधीक्षण पुरातत्वविद मोहन चंद्र जोशी के अनुसार, वर्ष 1952–54 के बीच पुरातत्वविद टी.एन. रामचंद्रन ने जगतग्राम में तीन अश्वमेध यज्ञों की वेदिकाओं की पहचान की थी। उस समय ईंटों से बनी संरचनाएं मिली थीं, जिन्हें उड़ते गरुड़ के आकार की वेदिका बताया गया। ईंटों पर तीसरी शताब्दी ईस्वी की ब्राह्मी लिपि और संस्कृत के प्रमाण भी मिले थे, जिनमें चार अश्वमेध यज्ञों का उल्लेख है। तभी से चौथी यज्ञ वेदिका की खोज लंबित थी।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया
अधीक्षण पुरातत्वविद ने बताया कि वर्तमान खुदाई में चार ट्रेंच बनाकर काम किया जा रहा है। अभी तक चौथी यज्ञ वेदिका का स्पष्ट पता नहीं चला है, लेकिन मृदभांड, घड़े और प्राचीन ईंटों की प्राप्ति से स्थल की पुरातात्विक महत्ता की पुष्टि होती है। अवधि की सटीक पहचान के लिए टीएल और ओएसएल डेटिंग कराई जाएगी, साथ ही खोदाई के अंतिम स्थल की मिट्टी की भी जांच होगी।
आंकड़े और तथ्य
अब तक करीब साढ़े चार मीटर की खोदाई पूरी हो चुकी है। लगभग ढाई मीटर और गहराई में खुदाई बाकी है। अधिकारियों के मुताबिक, यदि निर्धारित गहराई तक भी वेदिका का संकेत नहीं मिलता, तो आसपास के क्षेत्रों में अतिरिक्त खुदाई पर विचार किया जाएगा।
आगे क्या होगा
डेटिंग के नतीजों से अश्वमेघ यज्ञ की सटीक कालावधि तय होने की उम्मीद है। इससे न केवल यज्ञ से जुड़ी जानकारी स्पष्ट होगी, बल्कि उस दौर की सभ्यता, तकनीक और धार्मिक परंपराओं पर भी नई रोशनी पड़ेगी। एएसआई का कहना है कि परिणाम आने के बाद आगे की रणनीति तय की जाएगी।







