
नई टिहरी: देवभूमि उत्तराखंड का पारंपरिक लोक पर्व इगास बग्वाल (बूढ़ी दीपावली) आज पूरे उल्लास और लोक रंग में टिहरी जिले में मनाया गया। बौराड़ी स्टेडियम में आयोजित सामूहिक कार्यक्रम में ढोल-दमाऊं की थाप, भैलो और लोकगीतों के बीच लोगों ने पारंपरिक आनंद लिया। कार्यक्रम में महिलाओं, बच्चों और कलाकारों की सहभागिता ने इसे एक जीवंत सांस्कृतिक उत्सव का रूप दे दिया।
टिहरी में सामूहिक आयोजन की झलक
बौराड़ी स्टेडियम में नवयुवक अभिनय श्रीरामकृष्ण लीला समिति, टिहरी सांस्कृतिक समिति, नगर पालिका और जिला प्रशासन की संयुक्त पहल पर इगास बग्वाल का सामूहिक आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य स्थानीय लोक संस्कृति और परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना रहा।
पारंपरिक व्यंजनों की खुशबू से महका मैदान
स्वयं सहायता समूहों (SHGs) से जुड़ी महिलाओं ने पारंपरिक व्यंजन — दाल के पकौड़े, स्वांले और झंगोरा की खीर तैयार की।
इन्हें लोगों ने मिलकर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया। इस दौरान स्थानीय उत्पादों की झलक दिखाते ग्रामीण स्टॉल भी आकर्षण का केंद्र बने रहे।
छात्रों में दिखा लोक संस्कृति का उत्साह
इगास पर्व पर स्कूली छात्र-छात्राओं के बीच रंगोली और दीपोत्सव प्रतियोगिताएं कराई गईं। विजेताओं को मंच पर सम्मानित किया गया, जिससे छात्रों में उत्साह का माहौल रहा। रंग-बिरंगी सजावट और दीपों की रोशनी से पूरा स्टेडियम सांस्कृतिक रंगों में सराबोर दिखा।
शाम को खेले गए 200 भैलो
शाम ढलते ही ढोल-दमाऊं की थाप और लोकगीतों की धुनों पर लोगों ने पारंपरिक भैलो खेलने की शुरुआत की। भैलो — जो चीड़ की लीसायुक्त लकड़ी से बनाए जाते हैं — इगास पर्व का प्रमुख प्रतीक हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, “भैलो खेले बिना इगास अधूरी मानी जाती है।”
वीर माधो सिंह भंडारी पर आधारित नाटिका रही आकर्षण का केंद्र
कार्यक्रम का सबसे प्रमुख आकर्षण रहा वीर भड़ माधो सिंह भंडारी के जीवन पर आधारित प्रेरक नृत्य-नाटिका, जिसे नवयुवक अभिनय समिति के कलाकारों ने प्रस्तुत किया। नाटिका ने दर्शकों को 17वीं सदी के उस गौरवशाली काल में ले गया जब मलेथा गांव के वीर माधो सिंह भंडारी ने तिब्बत के दावा क्षेत्र तक विजय पताका फहराई थी।
इगास की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
कथाओं के अनुसार, जब वीर माधो सिंह भंडारी युद्ध के लिए तिब्बत गए थे, तो दीपावली उस वर्ष नहीं मनाई गई थी। परंतु जब वे विजय प्राप्त कर लौटे, तो पूरे गढ़वाल में दीप जलाकर खुशी मनाई गई — यही दिन “इगास बग्वाल” के रूप में जाना गया। तभी से कार्तिक एकादशी के दिन यह पर्व मनाने की परंपरा चली आ रही है।
परंपरा और आधुनिकता का संगम
कार्यक्रम में जहां लोक नृत्य और गीतों ने संस्कृति की झलक दी, वहीं युवाओं ने सोशल मीडिया पर #IgasBagwal और #TehriFestival जैसे हैशटैग से इस पर्व को वैश्विक पहचान दिलाने का प्रयास किया। जिला प्रशासन ने इसे पर्यटन और सांस्कृतिक संरक्षण के मॉडल आयोजन के रूप में सराहा।
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