
धर्म डेस्क: नववर्ष की शुरुआत इस बार गुरु प्रदोष व्रत के शुभ संयोग के साथ हुई, जिसे सनातन परंपरा में अत्यंत फलदायी माना जाता है। जब प्रदोष व्रत गुरुवार के दिन पड़ता है, तब यह केवल भगवान शिव की आराधना तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसमें भगवान विष्णु की कृपा का योग भी बनता है। यही कारण है कि इस दिन शिव-विष्णु पूजन को विशेष महत्व दिया जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गुरु प्रदोष व्रत से वर्ष का आरंभ होना सकारात्मक ऊर्जा, स्थिरता और सुख-समृद्धि का संकेत माना जाता है। ऋषिकेश सहित उत्तराखंड के कई मंदिरों में इस अवसर पर विशेष आरती, जलाभिषेक और सामूहिक पूजन का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया।
गुरु प्रदोष व्रत का धार्मिक महत्व
गुरु प्रदोष व्रत में “गुरु” का संबंध बृहस्पति ग्रह से होता है, जो ज्ञान, धर्म और विस्तार का प्रतीक माना जाता है। जब प्रदोष व्रत गुरुवार को पड़ता है, तब यह जीवन में सही निर्णय, वैवाहिक सुख और आध्यात्मिक उन्नति के लिए विशेष फल देता है। माना जाता है कि इस दिन शिव-विष्णु का संयुक्त पूजन करने से वर्ष भर आने वाली बाधाएं स्वतः कम होती हैं।
शिव-विष्णु पूजन का महत्व
शिव को संहार और वैराग्य का प्रतीक माना जाता है, जबकि विष्णु पालन और संतुलन के अधिष्ठाता हैं। गुरु प्रदोष व्रत पर इन दोनों का पूजन जीवन में संतुलन बनाए रखने का संदेश देता है। श्रद्धालु मानते हैं कि शिव की कृपा से नकारात्मकता दूर होती है और विष्णु की आराधना से स्थायित्व व सुरक्षा प्राप्त होती है।
गुरु प्रदोष व्रत की पूजा विधि और समय
गुरु प्रदोष व्रत की पूजा संध्या काल में करना सर्वोत्तम माना जाता है। इस समय किया गया पूजन शीघ्र फल देने वाला माना जाता है। नीचे दी गई तालिका में पूजा से जुड़ी आवश्यक जानकारी को सरल रूप में समझा जा सकता है।
| विषय | जानकारी |
|---|---|
| व्रत का दिन | गुरुवार |
| पूजा का शुभ समय | सूर्यास्त के बाद संध्या काल |
| मुख्य देवता | भगवान शिव और भगवान विष्णु |
| व्रत का लाभ | सुख-समृद्धि, ज्ञान और पारिवारिक शांति |
वर्तमान समय में गुरु प्रदोष व्रत की प्रासंगिकता
आज के तनावपूर्ण जीवन में गुरु प्रदोष व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानसिक शांति और सकारात्मक सोच को बढ़ाने का माध्यम भी बन गया है। ऋषिकेश जैसे आध्यात्मिक नगर में इसे नववर्ष के संकल्पों से जोड़कर देखा जा रहा है, जहां लोग स्वास्थ्य, पारिवारिक सुख और आत्मिक शांति की कामना के साथ यह व्रत रखते हैं।
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गुरु प्रदोष व्रत से हुई नववर्ष की शुरुआत धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ मानी जाती है। शिव-विष्णु पूजन का यह संयोग आने वाले समय में संतुलन, आस्था और सकारात्मक ऊर्जा को मजबूत करता है। यदि श्रद्धा और विधि के साथ यह व्रत रखा जाए, तो यह वर्ष भर आध्यात्मिक और पारिवारिक सुख प्रदान कर सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
गुरु प्रदोष व्रत क्यों महत्वपूर्ण माना जाता है?
गुरु प्रदोष व्रत इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह गुरुवार के दिन पड़ने वाला प्रदोष व्रत होता है, जिसमें भगवान शिव के साथ भगवान विष्णु की कृपा का योग बनता है। मान्यता है कि यह व्रत जीवन में स्थिरता, ज्ञान और सकारात्मक सोच को बढ़ाता है।
गुरु प्रदोष व्रत में पूजा करने का सही समय क्या होता है?
इस व्रत की पूजा सूर्यास्त के बाद संध्या काल में करना सबसे शुभ माना जाता है। इसी समय भगवान शिव और विष्णु की आराधना करने से व्रत का पूर्ण फल मिलता है।
क्या गुरु प्रदोष व्रत नववर्ष की शुरुआत के लिए शुभ होता है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नववर्ष की शुरुआत गुरु प्रदोष व्रत से होना बहुत शुभ संकेत माना जाता है। इससे पूरे वर्ष में सुख, शांति और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।
गुरु प्रदोष व्रत में किन देवताओं की पूजा की जाती है?
इस व्रत में मुख्य रूप से भगवान शिव की पूजा की जाती है, लेकिन गुरुवार होने के कारण भगवान विष्णु की पूजा का भी विशेष महत्व होता है। दोनों का पूजन जीवन में संतुलन का प्रतीक माना जाता है।
क्या गुरु प्रदोष व्रत हर कोई रख सकता है?
हाँ, गुरु प्रदोष व्रत कोई भी श्रद्धालु रख सकता है। यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी माना जाता है जो मानसिक शांति, पारिवारिक सुख और सही दिशा की कामना करते हैं।
गुरु प्रदोष व्रत रखने से कौन से लाभ मिलते हैं?
मान्यता है कि इस व्रत को श्रद्धा के साथ रखने से जीवन की बाधाएं कम होती हैं, निर्णय क्षमता बेहतर होती है और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।







