
देहरादून: पालीथिन का बढ़ता इस्तेमाल अब केवल पर्यावरण के लिए ही नहीं, बल्कि वन्यजीवों के लिए भी गंभीर खतरा बनता दिख रहा है। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में पहली बार हाथियों के डंग (मल) में पालीथिन के प्रमाण मिलने से वन्यजीव विशेषज्ञों की चिंता बढ़ गई है। इससे संकेत मिलता है कि हाथी ऐसा भोजन भी निगल रहे हैं, जो पालीथिन में लिपटा हुआ होता है। भोजन के साथ पालीथिन का हाथियों के शरीर में जाना और फिर मल के साथ बाहर आना एक गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
हाल ही में वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान की एक टीम अध्ययन के सिलसिले में आशारोड़ी–मोहंड क्षेत्र में भ्रमण पर थी। इसी दौरान वैज्ञानिकों की नजर हाथियों के डंग पर पड़ी, जिसमें पालीथिन के अंश दिखाई दिए। इस दृश्य का एक वीडियो भी सामने आया, जो बाद में भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिकों तक पहुंचा।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया
भारतीय वन्यजीव संस्थान के वरिष्ठ विज्ञानी डा. पराग निगम ने इस मामले को बेहद गंभीर बताया। उन्होंने कहा कि इससे यह स्पष्ट होता है कि हाथी बहुल क्षेत्रों—जैसे राजाजी टाइगर रिजर्व, देहरादून वन प्रभाग और शिवालिक वन क्षेत्र से सटे इलाकों—में कचरा बिना उचित निस्तारण के पड़ा रहता है। इसी कचरे में मौजूद पालीथिन और सड़ा-गला भोजन हाथियों के पेट में जा रहा है।
स्थानीय प्रतिक्रिया
स्थानीय पर्यावरण प्रेमियों और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोगों का कहना है कि यह घटना कचरा प्रबंधन की कमजोरियों को उजागर करती है। उनका मानना है कि यदि जंगलों और आसपास के क्षेत्रों में कूड़े का सही ढंग से निस्तारण नहीं किया गया, तो भविष्य में वन्यजीवों के लिए खतरा और बढ़ सकता है।
आंकड़े और तथ्य
विशेषज्ञों के अनुसार भोजन के साथ पालीथिन निगलने से हाथियों और अन्य वन्यजीवों के पाचन तंत्र पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इससे पोषक तत्वों का अवशोषण कम हो जाता है और आंतरिक चोट का खतरा भी रहता है। वर्ष 2022 में एक अध्ययन के दौरान हरिद्वार और लैंसडौन वन प्रभाग में हाथियों के डंग के 32 प्रतिशत नमूनों में प्लास्टिक और अन्य अवशेष पाए गए थे, जिसके बाद सुधार के दावे किए गए थे।
पहले भी हो चुकी हैं ऐसी घटनाएं
देश और विदेश में प्लास्टिक निगलने से हाथियों की मौत के मामले सामने आ चुके हैं। तमिलनाडु के कोयंबटूर में एक गर्भवती हथिनी की मौत के बाद उसके पेट से प्लास्टिक और एल्युमिनियम फॉयल मिले थे। श्रीलंका में भी प्लास्टिक कचरा निगलने से करीब 20 हाथियों की मौत के मामले सामने आ चुके हैं।
आगे क्या होगा
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि हाथियों की सुरक्षा के लिए जंगलों और उसके आसपास कचरा निस्तारण की व्यवस्था को तुरंत सख्त और प्रभावी बनाना जरूरी है। साथ ही पालीथिन के इस्तेमाल पर नियंत्रण और जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता बताई जा रही है।
Rishikesh News आगे भी इस मामले की अपडेट देता रहेगा।
यदि आपके क्षेत्र में कोई घटना, समस्या या जानकारी हो तो हमें ईमेल या फोटो/वीडियो भेजें —
📩 rishikeshnews.com@gmail.com




