
देहरादून: अनोखी खुशबू और लाजवाब स्वाद के लिए प्रसिद्ध दून बासमती धीरे-धीरे खेती से गायब होती जा रही है। कृषि योग्य भूमि में कमी, आधुनिक किस्मों का बढ़ता उपयोग और उत्पादन में भारी गिरावट ने इस पारंपरिक चावल को लगभग विलुप्त कर दिया है। ऐसे समय में उत्तराखंड सरकार और देहरादून जिला प्रशासन ने दून बासमती को बचाने और उसकी पहचान को फिर से स्थापित करने के लिए बड़े स्तर पर पुनर्जीवन अभियान शुरू किया है, जिसके शुरुआती नतीजे उत्साहजनक दिख रहे हैं।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
दून बासमती एक समय देहरादून की शान और पहचान का प्रतीक हुआ करती थी। इसकी गुणवत्ता का सबसे बड़ा कारण यहां की मिट्टी और उच्च हिमालय से आने वाले खनिजयुक्त जल का खेतों तक पहुंचना रहा है, जिसने इसकी प्राकृतिक सुगंध को विशिष्ट बनाया। लेकिन पिछले दो दशकों में तेजी से फैलते शहरीकरण, निर्माण कार्य और खेती योग्य भूमि में भारी कमी के कारण दून बासमती का उत्पादन लगभग खत्म हो गया। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार देहरादून में वार्षिक उत्पादन केवल दस टन के आसपास रह गया है, जो पूरी तरह स्थानीय बाजार में ही खप जाता है।
आधिकारिक जानकारी
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने दून बासमती को पुनर्जीवित करने की जिम्मेदारी देहरादून जिला प्रशासन को सौंपी। प्रशासन ने सहसपुर और विकासनगर के किसानों को पारंपरिक टाइप-3 दून बासमती की खेती के लिए चुना, जिसके लिए बीज चयन, रोपाई तकनीक, प्रशिक्षण और मार्केट लिंक जैसी सुविधाएँ दी गईं।
कई महीनों के प्रयास के बाद ग्राम उत्थान विभाग ने किसानों से दो सौ क्विंटल से अधिक दून बासमती की सीधी खरीद 65 रुपये प्रति किलो की दर से की। यह पहली बार हुआ है जब दून बासमती के लिए सरकारी खरीद मॉडल लागू किया गया, जिससे किसानों को तेरह लाख रुपये से अधिक की सीधी आय हुई। प्रशासन का दावा है कि इस मॉडल ने किसानों में अगले वर्ष और बड़े क्षेत्र में दून बासमती की खेती करने का उत्साह पैदा किया है।
मुख्य विकास अधिकारी अभिनव शाह ने बताया कि पारंपरिक खेती करने वाले किसानों को क्लाइमेट फ्रेंडली प्रशिक्षण दिया गया है और फसल तैयार होने पर उन्हें प्रमाणपत्र प्रदान किए जाएंगे, जिससे दून बासमती को बाजार स्तर पर नई आधिकारिक पहचान मिलेगी। उन्होंने चेताया कि अगर कृषि भूमि तेजी से निर्माण में बदलती रही तो आने वाले कुछ वर्षों में दून बासमती का अस्तित्व केवल इतिहास बनकर रह जाएगा।
स्थानीय प्रतिक्रिया
किसानों का कहना है कि पहले दून बासमती की खेती जोखिमपूर्ण मानी जाती थी क्योंकि बाजार में इसकी सही कीमत नहीं मिलती थी, लेकिन सरकारी खरीद मॉडल के बाद उन्हें भरोसा मिला है कि यह फसल फिर से लाभकारी बन सकती है। कई किसानों ने बताया कि पहले वे आधुनिक किस्मों की ओर झुक गए थे, लेकिन अब पारंपरिक किस्म की खेती के लिए प्रेरित हो रहे हैं।
महिला स्वयं सहायता समूहों ने भी इस अभियान को नई दिशा दी है। समूहों में शामिल महिलाओं का कहना है कि उन्हें गुणवत्ता, पैकेजिंग और आपूर्ति से जुड़े प्रशिक्षण मिलने के बाद वे पहली बार इतने संगठित तरीके से दून बासमती उत्पादन और वितरण में भाग ले पा रही हैं। इनके अनुसार यह प्रयास न केवल इस विरासत को बचाने का माध्यम है, बल्कि ग्रामीण महिला शक्ति को आर्थिक रूप से सशक्त करने का भी बड़ा कदम है।
आगे क्या?
देहरादून जिला प्रशासन आने वाले वर्षों में दून बासमती के उत्पादन को कई गुना बढ़ाने की योजना बना रहा है। इसके लिए किसानों की संख्या बढ़ाने, उत्पादन क्षेत्रों का विस्तार करने और दून बासमती को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया गया है। प्रशासन एसओपी तैयार कर रहा है, जिसके आधार पर दून बासमती को एक संगठित ब्रांड पहचान दी जाएगी। उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले समय में दून बासमती अपनी पुरानी पहचान और प्रतिष्ठा को वापस हासिल कर सकेगी।





