
देहरादून: दिल्ली पुलिस और एनआईए अधिकारी बनकर साइबर ठगों ने देहरादून में एक बुजुर्ग को डिजिटल अरेस्ट का डर दिखाते हुए 40 लाख रुपये ठग लिए। ठगों ने आतंकवादियों के पास आधार कार्ड की फोटो मिलने, सुप्रीम कोर्ट से गैर-जमानती वारंट जारी होने और गिरफ्तारी का भय दिखाकर पीड़ित को मानसिक दबाव में रखा। तीन दिन तक लोकेशन साझा कराने, किसी से बात न करने की हिदायत और वीडियो कॉल पर फर्जी वारंट दिखाकर रकम ट्रांसफर कराई गई। मामले में साइबर क्राइम पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
हाल के महीनों में ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर ठगी के मामले बढ़े हैं, जिनमें ठग खुद को पुलिस, जांच एजेंसी या अदालत से जुड़ा बताकर लोगों को डराते हैं। भय और गोपनीयता की आड़ में पीड़ितों से बड़ी रकम ट्रांसफर कराई जाती है। देहरादून का यह मामला इसी पैटर्न का गंभीर उदाहरण है।
आधिकारिक जानकारी
पंडितवाड़ी निवासी मुकेश पांडे की शिकायत पर साइबर क्राइम पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की है। पीड़ित एलएनटी दिल्ली से सेवानिवृत्त कर्मचारी हैं। पुलिस के अनुसार 10 दिसंबर को एक कॉलर ने खुद को दिल्ली पुलिस मुख्यालय से बताकर आतंकवादियों के पास पीड़ित के आधार कार्ड की फोटो होने का दावा किया। इसके बाद प्रेम कुमार नामक व्यक्ति ने एनआईए अधिकारी बनकर सुप्रीम कोर्ट से गैर-जमानती वारंट जारी होने और गिरफ्तारी की बात कही। 13 दिसंबर को व्हाट्सएप वीडियो कॉल पर फर्जी वारंट दिखाकर एक एप डाउनलोड कराया गया और बैंक खाते के नाम पर रकम ‘सत्यापन’ के बहाने ट्रांसफर कराई गई।
स्थानीय प्रतिक्रिया
स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसे कॉल्स से बुजुर्ग और अकेले रहने वाले लोग ज्यादा प्रभावित होते हैं।
परिवारों ने अपील की है कि किसी भी डराने वाले कॉल पर तुरंत पुलिस या साइबर हेल्पलाइन से संपर्क किया जाए।
संख्या / आंकड़े
इस मामले में 40 लाख रुपये की ठगी हुई है।
ठगों ने पीड़ित को तीन दिन तक डिजिटल अरेस्ट में रखकर हर तीन घंटे में लोकेशन मांगी।
आगे क्या होगा
साइबर क्राइम पुलिस कॉल रिकॉर्ड, बैंक ट्रांजैक्शन, वीडियो कॉल और एप से जुड़े डिजिटल साक्ष्य जुटा रही है। संदिग्ध खातों की ट्रेसिंग और रकम की रिकवरी के प्रयास किए जा रहे हैं। पुलिस ने नागरिकों से अपील की है कि किसी भी एजेंसी के नाम से आने वाले डराने वाले कॉल पर भरोसा न करें और तुरंत 1930 साइबर हेल्पलाइन या नजदीकी पुलिस से संपर्क करें।





