
चमोली। विकासखंड पोखरी के दूरस्थ गंगा घाटी क्षेत्र के रानों, बमोथ और करछुना गांवों में होने वाली पारंपरिक पांडव लीला की तैयारियां ज़ोरों पर हैं। ग्रामीण सर्दी के मौसम को देखते हुए अलाव की व्यवस्था के लिए पर्याप्त लकड़ी जुटा रहे हैं, जबकि पांडवों की पुरानी पोशाकों की जगह नई वेशभूषा तैयार की जा रही है। हर तीसरे साल होने वाला यह आयोजन गांवों में सांस्कृतिक उत्साह और धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र बन जाता है।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
पांडव लीला उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। गंगा घाटी में यह आयोजन पीढ़ियों से आयोजित होता आया है और इसमें पौराणिक कथाओं, नृत्य, गीत और अनुष्ठानों का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। ग्रामीणों के लिए यह केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामुदायिक एकजुटता और परंपरा का उत्सव भी है।
ग्रामीणों की तैयारियाँ और उत्साह
रानों गांव में 18 दिसंबर से शुरू होने वाली पांडव लीला के लिए तैयारियाँ बड़ी तेजी से चल रही हैं। पांडव लीला समिति रानों के अध्यक्ष राजेंद्र सिंह भंडारी और सामाजिक कार्यकर्ता वीरेंद्र भंडारी ने बताया कि 21 दिसंबर को पांडवों के अस्त्र-शस्त्र गांव में पहुंचेंगे।
उधर बमोथ और करछुना गांवों में 30 दिसंबर से लीला प्रारंभ होगी और स्थानीय निवासी तैयारियों को अंतिम रूप दे रहे हैं। बमोथ समिति के अध्यक्ष प्रीतम सिंह ठाकुर और करछुना समिति के अध्यक्ष कुशाल सिंह नेगी ने बताया कि हर तीसरे वर्ष होने वाले इस आयोजन को लेकर ग्रामीणों में विशेष उत्साह है, और इस वर्ष तैयारियाँ पहले से अधिक भव्य रूप ले रही हैं।
मुख्य धार्मिक कार्यक्रम और तारीखें
पांडव लीला समिति बमोथ के अध्यक्ष प्रीतम सिंह ठाकुर ने बताया कि 30 दिसंबर को भूमियाल रावल और लाटू देवता की पूजा के साथ पांडव चौक में हनुमान ध्वज स्थापित किया जाएगा।
- 1 जनवरी को नारायण मंदिर से पांडवों के अस्त्र-शस्त्र (बाण) को पांडव चौक लाकर स्नान, सकलीकरण, पूजन और श्रृंगार की विधि सम्पन्न की जाएगी।
- 4 जनवरी को सांवल वृक्ष का आगमन होगा, जबकि 5 जनवरी को राजसूय यज्ञ और शिशुपाल वध लीला का मंचन किया जाएगा।
- 6 जनवरी को द्रौपदी चीरहरण और पांडवों के वनवास की लीला आयोजित होगी।
- 7 जनवरी को सेरा कौतिक और चक्रव्यूह कार्यक्रम का विशाल आयोजन होगा।
- 8 जनवरी को जल यात्रा और अस्त्र-शस्त्र को नारायण मंदिर में पुनः विराजमान कराया जाएगा, जिसके बाद 9 जनवरी को प्रसाद वितरण के साथ पांडव लीला का समापन होगा।
स्थानीय प्रतिक्रिया
गांव के बुजुर्गों और युवाओं का कहना है कि पांडव लीला न सिर्फ आस्था का प्रतीक है बल्कि सामाजिक सदभाव, कला और संस्कृति को जीवित रखने का माध्यम भी है। कई ग्रामीणों ने बताया कि वे इन तैयारियों में अपने दैनिक कामकाज से भी अधिक उत्साह से जुटते हैं, क्योंकि यह पर्व पूरे गांव को जोड़ता है।
आगे क्या
18 दिसंबर से शुरू होकर 11 दिनों तक चलने वाला यह आयोजन गंगा घाटी के तीनों गांवों में सांस्कृतिक उत्सव का माहौल बना देगा। स्थानीय समुदाय को उम्मीद है कि इस बार दर्शकों की संख्या पहले से अधिक होगी और पारंपरिक पांडव नृत्य व कथाओं का संरक्षण भी और मजबूत होगा।







