बदरीनाथ धाम में पंच पूजाएं सम्पन्न
बदरीनाथ (चमोली): बदरीनाथ धाम में कपाट बंद होने के दिन एक अनूठी और सदियों पुरानी परंपरा निभाई जाती है। मुख्य पुजारी (रावल) माता लक्ष्मी को गर्भगृह में विराजमान कराने से पहले स्त्री वेश धारण करते हैं और विशेष पूजा-अर्चना सम्पन्न करते हैं। इसी पवित्र प्रक्रिया के बाद मंदिर के कपाट छह माह के लिए बंद किए जाते हैं।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
बदरीनाथ धाम में कपाट बंदी की प्रक्रिया पाँच दिन तक चलने वाली पंच पूजाओं का अंतिम चरण होती है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण रस्म माता लक्ष्मी को गर्भगृह में स्थापित करना माना जाता है। मान्यता है कि शीतकाल के छह महीनों तक भगवान बदरीविशाल तप में लीन रहते हैं और इस अवधि में माता लक्ष्मी उनके समीप निवास करती हैं।
आधिकारिक / पारंपरिक जानकारी
कपाट बंद होने से ठीक पहले रावल माता लक्ष्मी की सखी बनकर स्त्री वेश धारण करते हैं। इसके बाद माता लक्ष्मी की प्रतिमा को विशेष मंत्रोच्चार और वैदिक विधि के साथ बदरीनाथ गर्भगृह में विराजमान कराया जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार यह क्षण रावल के लिए अत्यंत भावुक होता है, क्योंकि अगले छह माह तक वे भगवान बदरीनाथ के नियमित पूजन से दूर रहते हैं।
बदरीनाथ के पूर्व धर्माधिकारी भुवन चंद्र उनियाल बताते हैं कि परंपरा अनुसार, माता लक्ष्मी को स्थापित करने के बाद रावल उल्टे पांव मंदिर से बाहर आते हैं और बिना किसी को चेहरा दिखाए सीधे अपने आवास चले जाते हैं। यह प्रक्रिया शीतकाल की शुरुआत और कपाट बंद होने का प्रतीक मानी जाती है।
स्थानीय प्रतिक्रिया
कपाट बंद होने के दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस परंपरा के साक्षी बनना पवित्र अवसर मानते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि माता लक्ष्मी की गर्भगृह में स्थापना आध्यात्मिक रूप से अत्यंत खास होती है और यह क्षण पूरे वातावरण को भक्ति से भर देता है।
विशेष विशेषता — पुष्प शृंगार
साल भर भगवान बदरीनाथ का शृंगार आभूषणों और परंपरागत अलंकरण से किया जाता है, लेकिन कपाट बंद होने के दिन भगवान का शृंगार केवल फूलों से किया जाता है। भगवान का यह पुष्प स्वरूप भक्तों के लिए अत्यंत दुर्लभ और पवित्र माना जाता है, क्योंकि पूरे वर्ष यही एक दिन होता है जब वे फूलों से सजे रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं।
आगे क्या
कपाट बंद होने के बाद शीतकाल में भगवान बदरीविशाल की पूजा-अर्चना परंपरा अनुसार पांडुकेश्वर के योगध्यान बदरी मंदिर में की जाएगी, जहां छह माह तक श्रद्धालु दर्शन कर सकेंगे।







