
बदरीनाथ: उत्तराखंड के बदरीनाथ में कुबेर पर्वत से एक ग्लेशियर टूटकर कंचन गंगा नाले में गिर गया। इस घटना से कोई नुकसान नहीं हुआ है, लेकिन चमोली जिले की पिछली ग्लेशियर और हिमस्खलन की घटनाओं को देखते हुए प्रशासन ने सतर्कता बढ़ा दी है। उप जिलाधिकारी चंद्रशेखर वशिष्ठ ने बताया कि ग्लेशियर के साथ कुछ चट्टानें भी टूटीं, लेकिन कोई जनहानि या संपत्ति का नुकसान नहीं हुआ। यह पहली बार नहीं है जब इस क्षेत्र में ग्लेशियर टूटने की घटना हुई हो।
घटना का विवरण
उप जिलाधिकारी चंद्रशेखर वशिष्ठ ने कहा, “कुबेर पर्वत से ग्लेशियर का एक हिस्सा टूटकर कंचन गंगा नाले में गिरा। हमने क्षेत्र का निरीक्षण किया और पाया कि कोई नुकसान नहीं हुआ है।” प्रशासन ने स्थानीय लोगों और तीर्थयात्रियों को सतर्क रहने की सलाह दी है। कंचन गंगा नाला बदरीनाथ के पास एक महत्वपूर्ण जल स्रोत है, और इस तरह की घटनाएं क्षेत्र की भौगोलिक संवेदनशीलता को दर्शाती हैं।
चमोली में ग्लेशियर टूटने का इतिहास
चमोली जिला पहले भी ग्लेशियर और हिमस्खलन की घटनाओं का गवाह रहा है। 28 फरवरी 2025 को माणा कैंप के पास भारत-चीन (तिब्बत) सीमा क्षेत्र में भारी हिमस्खलन हुआ था। इस दौरान निर्माण कार्य में लगे 55 मजदूर बर्फ में दब गए थे। हालांकि, राहत और बचाव कार्यों से कई मजदूरों को सुरक्षित निकाला गया था।
इससे पहले, 2021 में रैणी गांव में ग्लेशियर टूटने से ऋषिगंगा में बाढ़ आई थी, जिसने भारी तबाही मचाई। इस आपदा में 206 लोगों की मौत हुई थी, और कई गांव प्रभावित हुए थे। 2024 की एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, चमोली में ग्लेशियर टूटने और हिमस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिसका कारण जलवायु परिवर्तन और हिमालयी क्षेत्रों की नाजुक पारिस्थितिकी है।
ग्लेशियर टूटने के कारण और चिंताएं
वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, तापमान में वृद्धि, और मानवीय गतिविधियां ग्लेशियर टूटने की घटनाओं को बढ़ा रही हैं। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के अनुसार, उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे हिमस्खलन और बाढ़ का खतरा बढ़ गया है। कंचन गंगा नाले में ग्लेशियर का टूटना छोटी घटना हो सकती है, लेकिन यह भविष्य में बड़ी आपदाओं की आशंका को दर्शाता है।
उप जिलाधिकारी वशिष्ठ ने कहा, “हम स्थिति पर नजर रख रहे हैं। ग्लेशियर टूटने की घटनाएं हिमालयी क्षेत्रों में सामान्य हैं, लेकिन हमें सतर्क रहना होगा।” प्रशासन ने क्षेत्र में निगरानी बढ़ाने और आपदा प्रबंधन टीमें तैयार रखने के निर्देश दिए हैं।
स्थानीय और प्रशासनिक प्रतिक्रिया
बदरीनाथ क्षेत्र में तीर्थयात्रियों की सुरक्षा के लिए प्रशासन ने अतिरिक्त कदम उठाए हैं। एसडीआरएफ और स्थानीय पुलिस को संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी के लिए तैनात किया गया है। स्थानीय लोगों ने मांग की है कि सरकार ग्लेशियर टूटने और हिमस्खलन की घटनाओं की निगरानी के लिए आधुनिक तकनीकों जैसे रिमोट सेंसिंग और ड्रोन का उपयोग करे।
2024 में उत्तराखंड आपदा प्रबंधन विभाग ने हिमालयी क्षेत्रों में 20 निगरानी केंद्र स्थापित किए थे, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इन केंद्रों की संख्या और तकनीकी क्षमता बढ़ाने की जरूरत है।
सतर्कता और तैयारी की जरूरत
बदरीनाथ में कुबेर पर्वत से ग्लेशियर टूटने की घटना भले ही छोटी हो, लेकिन यह उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों की नाजुक स्थिति को उजागर करती है। चमोली में पहले हुई आपदाओं ने प्रशासन और स्थानीय लोगों को सतर्क कर दिया है। ग्लेशियर टूटने की घटनाओं को रोकने के लिए जलवायु संरक्षण, निगरानी प्रणाली, और आपदा प्रबंधन को मजबूत करना जरूरी है।






