
धर्म डेस्क: अक्सर लोगों की धारणा होती है कि संसार में केवल भगवद् गीता ही एकमात्र गीता है, लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है। वास्तव में भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में 300 से अधिक ग्रंथ ऐसे हैं, जिनके नाम के साथ ‘गीता’ जुड़ा हुआ है। हर गीता अपने आप में जीवन, चेतना और आत्मबोध की अलग-अलग परतों को खोलती है।
ऋषिकेश, जिसे योग और आत्मज्ञान की भूमि माना जाता है, वहां साधकों के बीच केवल भगवद् गीता ही नहीं, बल्कि कई अन्य गीताओं का भी नियमित अध्ययन होता है। इन्हीं में से एक अत्यंत गूढ़ और प्रभावशाली ग्रंथ है अष्टावक्र गीता, जिसे ज्ञान मार्ग का शुद्धतम रूप माना जाता है।
इस लेख में हम समझेंगे कि भगवद् गीता ही नहीं, दुनिया में 300 से अधिक गीताएं क्यों मानी जाती हैं और अष्टावक्र गीता का महत्व इतना अद्भुत क्यों कहा जाता है।
दुनिया में 300 से अधिक गीताएं क्यों मानी जाती हैं
‘गीता’ शब्द का अर्थ है—उपदेश या ज्ञान का संवाद। भारत की दार्शनिक परंपरा में जब भी किसी ऋषि या गुरु ने शिष्य को आत्मज्ञान का उपदेश संवाद के रूप में दिया, वह ग्रंथ ‘गीता’ कहलाया। इसी कारण अलग-अलग काल, संप्रदाय और दर्शन में अनेक गीताओं की रचना हुई।
इनमें देवता, ऋषि, योगी और संत सभी शामिल हैं। हर गीता जीवन के किसी न किसी पक्ष—कर्म, भक्ति, ज्ञान या वैराग्य—पर प्रकाश डालती है।
अष्टावक्र गीता का अद्भुत महत्व
अष्टावक्र गीता का संवाद राजा जनक और ऋषि अष्टावक्र के बीच हुआ माना जाता है। यह ग्रंथ अद्वैत वेदांत पर आधारित है और आत्मा की पूर्ण स्वतंत्रता पर जोर देता है। इसमें कर्मकांड, नियम या बाहरी साधनाओं से अधिक आत्मबोध को महत्व दिया गया है।
ऋषिकेश के कई आश्रमों में आज भी अष्टावक्र गीता का अध्ययन ध्यान और मौन साधना के साथ कराया जाता है। साधकों का मानना है कि यह ग्रंथ सीधे मन की जड़ों पर प्रहार करता है और अहंकार को तोड़कर शुद्ध चेतना की ओर ले जाता है।
अष्टावक्र गीता और भगवद् गीता में अंतर
जहां भगवद् गीता कर्म, भक्ति और ज्ञान तीनों मार्गों का संतुलन सिखाती है, वहीं अष्टावक्र गीता केवल ज्ञान मार्ग पर केंद्रित है। इसमें कहा गया है कि व्यक्ति पहले से ही मुक्त है, उसे केवल इस सत्य को पहचानना है।
यही कारण है कि अष्टावक्र गीता को पढ़ना आसान नहीं, लेकिन समझ में आ जाए तो यह जीवन की दृष्टि ही बदल देती है।
निष्कर्ष
यह जानना रोचक है कि भगवद् गीता ही नहीं, दुनिया में 300 से अधिक गीताएं मौजूद हैं, और हर गीता का अपना अलग महत्व है। अष्टावक्र गीता इनमें एक ऐसा ग्रंथ है, जो बाहरी आडंबर से हटकर सीधे आत्मा से संवाद करता है। ऋषिकेश जैसे आध्यात्मिक केंद्रों में इसका महत्व आज भी उतना ही जीवंत है, जितना प्राचीन काल में था।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
क्या सच में भगवद् गीता के अलावा भी कई गीताएं हैं?
हां, भगवद् गीता के अलावा भी भारतीय परंपरा में 300 से अधिक ग्रंथ ऐसे माने जाते हैं, जिनके नाम के साथ ‘गीता’ जुड़ा है। ये अलग-अलग काल और विचारधाराओं में रची गई हैं।
अष्टावक्र गीता किस तरह की गीता है?
अष्टावक्र गीता एक गूढ़ आध्यात्मिक ग्रंथ है, जो आत्मज्ञान और अद्वैत दर्शन पर केंद्रित है। इसमें बाहरी पूजा-पाठ से अधिक आत्मबोध पर जोर दिया गया है।
क्या अष्टावक्र गीता पढ़ना आम व्यक्ति के लिए कठिन है?
इसे पढ़ना कठिन नहीं है, लेकिन इसकी बातें गहरी होती हैं। यदि कोई व्यक्ति धैर्य और खुले मन से पढ़े, तो इसका संदेश धीरे-धीरे समझ में आने लगता है।
भगवद् गीता और अष्टावक्र गीता में मुख्य अंतर क्या है?
भगवद् गीता जीवन में कर्म करते हुए संतुलन सिखाती है, जबकि अष्टावक्र गीता यह बताती है कि आत्मा पहले से ही मुक्त है और उसे केवल इस सत्य को पहचानना है।
ऋषिकेश में अष्टावक्र गीता का अध्ययन क्यों किया जाता है?
ऋषिकेश ध्यान, योग और आत्मचिंतन की भूमि मानी जाती है। अष्टावक्र गीता का दर्शन इन्हीं साधनाओं से जुड़ा होने के कारण यहां इसका अध्ययन लोकप्रिय है।
क्या अष्टावक्र गीता जीवन में व्यावहारिक बदलाव ला सकती है?
हां, कई लोग मानते हैं कि इस ग्रंथ को समझने से जीवन को देखने का नजरिया बदलता है और व्यक्ति अनावश्यक तनाव से मुक्त होना सीखता है।







