(सम्पादकीय: व्यंग्य की चटपटी चटनी में डूबा एक कड़वा सच)
चुनावी सर्कस का ग्रैंड ओपनिंग: बरसाती मेंढकों की कूद-फांद!
तो लीजिए साहब, उत्तराखंड में सर्कस का तमाशा फिर से शुरू हो चुका है! तंबू गड़ गए, झंडे लहरा रहे, और हमारे बरसाती मेंढक—सॉरी, माननीय नेतागण—अपने चटकीले मेकअप और जोशीले नारों के साथ मंच पर टर्र-टर्र की ताल में कूदने लगे हैं। चुनाव का बिगुल बजते ही चार साल की गहरी नींद से जागे ये मेंढक अब ऐसे उछल रहे हैं, जैसे बरसात की पहली फुहार में तालाब से बाहर निकल आए हों। हर गली-नुक्कड़ पर “जनसंपर्क रैलियां”, “विकास रथ”, और “जनता दरबार” का ढोल-नगाड़ा शुरू है। सड़कें गड्ढों में डूबी हैं, अस्पतालों में दवाइयां गायब हैं, युवा बेरोजगारी के जंगल में भटक रहे हैं, लेकिन इन मेंढकों को अब जाकर ये सब दिख रहा है। अरे भाई, क्या चुनावी चश्मा ही आंखों पर चढ़ाना पड़ता है? वाह रे लोकतंत्र, तेरा जादू तो सर्कस के जोकरों को भी फेल कर दे!
नारियल पानी से “राष्ट्रीय संकट” तक
देवभूमि अब “आंदोलनखण्ड” का तमगा लिए टर्राती फिर रही है। हर छोटी-मोटी बात को तमाशा बनाने का ठेका इन बरसाती मेंढकों ने ले रखा है। हाल ही में ऋषिकेश की सड़कों पर नारियल पानी बेचने वाले भइया अचानक “राष्ट्रीय संकट” बन गए। कुछ तथाकथित “संगठन” के मेंढक कैमरे और माइक लिए वहां टपक पड़े। अरे भाई, नारियल पानी बेचने वाला तो बस अपने दो टाइम की रोटी का जुगाड़ कर रहा था, तुम तो पूरा देश बचाने की स्क्रिप्ट लेकर आ गए! हेडलाइन तैयार—“सनसनीखेज खुलासा: नारियल पानी में छुपा अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र!” कैमरा घूमता है, बाइट रिकॉर्ड होती है, और अगले दिन अखबार चिल्लाते हैं कि “उत्तराखंड में सनसनी!” अरे साहब, सनसनी तो तब होगी जब स्कूलों में टीचर हों, अस्पतालों में डॉक्टर मिलें, या बेरोजगारों को नौकरी मिले। लेकिन नहीं, इन मेंढकों की आंखें तो नारियल पानी की दुकानों पर ही अटककर रह गई हैं। शायद वो सोच रहे हैं कि नारियल पानी से ही उत्तराखंड का GDP उछाल मार देगा!
पहाड़ों का दर्द: गड्ढों का साम्राज्य, मोबाइल की लाइट में इलाज
जरा उत्तराखंड के पहाड़ों की ओर नजर डालिए, जहां जनता का दर्द आसमान छू रहा है। ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाएं बस नेताओं के चुनावी भाषणों में जिंदा हैं। शिक्षा? स्कूल खंडहरों की तरह खड़े हैं, टीचर तो बस किताबों में बचे हैं। स्वास्थ्य? अस्पतालों में दवाइयां ढूंढो तो मिलें नहीं, और डॉक्टर साहब मोबाइल की टॉर्च जलाकर मरीजों का इलाज करने को मजबूर हैं। गंभीर मरीज और गर्भवती महिलाएं टूटी सड़कों पर समय से अस्पताल नहीं पहुंच पाते, और कई बार रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। पेयजल? जल जीवन मिशन की टंकियां तो बंट गईं, लेकिन पाइपलाइन? वो तो नेताओं के वादों की तरह सालों से अधर में लटकी है।
यातायात? सड़कों की जगह अब गड्ढों का साम्राज्य है। बरसात आती है, और गांवों का संपर्क दुनिया से कट जाता है। ग्रामीण चिल्ला-चिल्लाकर कहते हैं कि नदियों पर पुलों की स्वीकृति तो चुनावी मंचों पर मिल जाती है, लेकिन काम? वो तो नेताओं की नीयत की तरह हमेशा अधूरा। और हां, विकास का एक नमूना जरूर चमक रहा है—अंग्रेजी शराब के ठेके! जी हां, ये ठेके अब गांव-गांव में खिले हैं, जैसे उत्तराखंड का “विकास मॉडल” यही हो। जनता पूछ रही है—क्या प्यास बुझाने के लिए पानी नहीं, सिर्फ दारू चाहिए?
आंदोलन की फैक्ट्री: हर मुद्दा, एक नया नाटक
उत्तराखंड की राजनीति अब आंदोलनों की फैक्ट्री बन चुकी है। बिजली का बिल हो, पानी की किल्लत हो, या पंचायत चुनाव में धांधली—हर मुद्दा पलक झपकते धरने-प्रदर्शन में बदल जाता है। हर बरसाती मेंढक चाहता है कि वो “मुद्दे का सुपरस्टार” बन जाए। कभी सड़क जाम, कभी ट्वीट-तूफान, कभी धरना-ड्रामा—बस यही टर्र-टर्र का राग चलता रहता है। उत्तराखंड ने सच्चे आंदोलनों की मिसाल दी थी, लेकिन अब? अब तो हर दूसरा दिन कोई मेंढक सड़क पर टर्राने उतर आता है, जैसे सड़कें धरनों का रैंप हों। और जनता? वो तमाशबीन बनकर तालियां पीटती है, मोबाइल में रील्स बनाती है, और फिर सब भूलकर अपने दुखों के तालाब में डूब जाती है। अरे भाई, रील्स बनाने से सड़कें ठीक हो जाएंगी क्या?
चुनावी जादू: गड्ढों में “विकास”, वादों का मायाजाल
चुनावी मौसम में ये तमाशा और चटकीला हो जाता है। वो सड़कें, जो गड्ढों की शोभा बढ़ा रही हैं, अचानक “विकास का चमत्कार” बन जाती हैं। वो पुल, जो दशकों से कागजों में लटके हैं, रातों-रात “शिलान्यास” के बोर्ड से सज जाते हैं। शराब के ठेके, रेत का अवैध खनन, और भ्रष्टाचार के किस्से—ये सब इन बरसाती मेंढकों को सिर्फ चुनाव के वक्त दिखाई देते हैं। बाकी समय? “सब चंगा सी”। और हमारी जनता, बेचारी, हर बार इनके टर्र-टर्र की लोरी सुनकर फिर से नींद में चली जाती है। नेताओं के वादे तो चांद-तारे तोड़ लाते हैं, लेकिन जनता के हिस्से सिर्फ टूटे गड्ढे आते हैं।
पहाड़ों का सवाल: सत्ता की मलाई या जनता की सेवा?
पहाड़ की जनता अब सवाल उठा रही है—क्या हमारा प्रतिनिधित्व सिर्फ सत्ता की मलाई खाने के लिए है? शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, और सड़कें—ये बुनियादी जरूरतें कब पूरी होंगी? या फिर उत्तराखंड का विकास सिर्फ अंग्रेजी शराब के ठेकों और चुनावी वादों के पोस्टरों तक सिमटकर रह जाएगा? नेताओं का मौसमी जागरण हर पांच साल में आता है, लेकिन जनता का दर्द सालों से अनसुना पड़ा है। क्या नेताजी, आपकी गाड़ी के टायर तो नहीं टूटते, तो फिर जनता की जिंदगी के गड्ढे क्यों नहीं दिखते?
जागो, उत्तराखंड, जागो!
ये बरसाती मेंढकों का मौसमी टर्र-टर्र कोई नई कहानी नहीं। हर पांच साल में यही नौटंकी दोहराई जाती है। “विकास लाएंगे”, “रोजगार देंगे”, “सड़कें बनाएंगे”—ये वादे इतने घिस चुके हैं कि अब तो पोस сути लागे छैं। लेकिन जनता भी तो कमाल की है। हर बार वही चेहरों को, वही वादों को, वही नारों को वोट दे आती है। और फिर पांच साल तक इंतजार करती है कि शायद इस बार कुछ बदल जाए। लेकिन बदलता क्या है? बस इन मेंढकों की गाड़ियां, उनके बंगले, और उनके बैंक बैलेंस। जनता के हिस्से तो बस वही टूटी सड़कें और खाली जेबें।
तो इस बार, हे उत्तराखंड की प्यारी जनता, थोड़ा सा जाग जाओ। इन बरसाती मेंढकों के टर्र-टर्र और चटकीले वादों की चाशनी में मत बहो। काम को परखो, नीयत को देखो, नतीजे मांगो। अगर इस बार तुमने सिर्फ नारों और भावनाओं के पीछे वोट नहीं फेंका, तो यही इस राज्य का सबसे बड़ा “आंदोलन” होगा। वरना ये चक्र चलता रहेगा—चार साल की खामोशी, कुछ महीनों का टर्र-टर्र, और फिर वही पुरानी निराशा।
आंदोलनखण्ड नहीं, असली उत्तराखंड चाहिए!
उत्तराखंड को अब आंदोलनों की नहीं, काम की जरूरत है। लेकिन अफसोस, यहां टर्राना आसान है, काम करना नहीं। इन बरसाती मेंढकों के लिए ये “आंदोलनखण्ड” हो सकता है, लेकिन जनता के लिए ये “उत्तराखंड” अब भी एक अधूरा सपना है। जागो, उत्तराखंड, जागो—वरना ये बरसाती मेंढक तुम्हें फिर से अपनी वादों की लोरी सुनाकर सुला देंगे, और तुम सुबह उठकर फिर गड्ढों में गिर पड़ोगे!
(लेखक की टिप्पणी: अगर ये सम्पादकीय आपको हंसाने के साथ-साथ सोचने पर मजबूर करे, तो इसे अपने पड़ोसी तक पहुंचाएं। शायद अगला “आंदोलन” वोटिंग बूथ पर हो, न कि नारियल पानी की दुकान या टूटी सड़कों पर!)
