
जयहरीखाल: सिरोबाड़ी गांव में शुक्रवार देर शाम बाघ के हमले में 60 वर्षीय महिला की मौत के बाद पूरे क्षेत्र में दहशत और आक्रोश है। घटना की जानकारी मिलते ही क्षेत्रीय विधायक दिलीप रावत मौके पर पहुंचे और सुरक्षा व्यवस्था व वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समाधान नहीं हुआ तो वे इस्तीफा देने तक का निर्णय ले सकते हैं।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
उत्तराखंड में मानव–वन्यजीव संघर्ष लगातार बढ़ रहा है। पौड़ी जिले के लैंसडाउन विधानसभा क्षेत्र में हाल के महीनों में बाघ के हमलों की घटनाएँ लगातार सामने आई हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वन विभाग की ओर से कोई प्रभावी रोकथाम नहीं की जा रही, जिससे क्षेत्र में भय का माहौल बना हुआ है।
अधिकारीक जानकारी
शुक्रवार शाम सिरोबाड़ी गांव में उर्मिला देवी मवेशियों के लिए घर के समीप चारापत्ती काट रही थीं। उनकी बहू प्रिया भी उनके साथ थी, लेकिन बच्चे के रोने की आवाज सुनकर वह घर लौट आई। इसी बीच झाड़ियों में छिपा बाघ अचानक बाहर आया और उर्मिला देवी पर हमला कर उन्हें करीब 50 मीटर दूर घसीट ले गया।
बहू प्रिया ने जब आसपास तलाश की तो थोड़ी दूरी पर बाघ को उर्मिला देवी के शव के पास बैठा देखा। उसकी चीख सुनकर ग्रामीण मौके पर पहुंचे और शोर मचाने पर बाघ जंगल की ओर भाग गया। मृतका के शव को बाहर निकालकर घर पहुंचाया गया और वन विभाग को सूचना दी गई।
घटना की जानकारी मिलते ही कालागढ़ टाइगर रिजर्व की टीम और क्षेत्रीय विधायक दिलीप रावत मौके पर पहुंचे।
विधायक दिलीप रावत का आक्रोश
पीड़ित परिवार से मिलने के दौरान विधायक रावत ने कहा कि क्षेत्र में वन्यजीवों के हमलों को रोकने में विभाग पूरी तरह विफल रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि जनता की सुरक्षा को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा।
उन्होंने कहा कि क्षेत्र में पुल तो बना दिए गए हैं, लेकिन उन्हें जोड़ने वाली सड़कें 11 साल से अधर में पड़ी हैं। सड़क न होने के कारण ग्रामीणों को जंगल के रास्तों से गुजरना पड़ता है और इसी वजह से वन्यजीवों का खतरा और बढ़ जाता है।
विधायक ने स्पष्ट संकेत दिया कि यदि उनकी मांगों—बाघ को पकड़ने या आवश्यक होने पर उसे मारने की अनुमति, और लंबित सड़क निर्माण—पर सरकार तुरंत कदम नहीं उठाती तो वे इस्तीफा देने के लिए बाध्य होंगे।
स्थानीय प्रतिक्रिया
ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन और वन विभाग हर घटना के बाद मौके पर पहुंचते हैं, लेकिन स्थायी समाधान की ओर कोई प्रयास दिखाई नहीं देता। महिलाओं और बच्चों में भय का माहौल है और लोग शाम होते ही घरों से बाहर निकलने में डरते हैं।
ग्रामीणों ने मांग की कि क्षेत्र में तुरंत शूटर, पिंजरा और सुरक्षा टीम तैनात की जाए, ताकि आगे ऐसी घटनाएँ रोकी जा सकें।
आगे की स्थिति
वन विभाग ने कहा कि घटना की विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जा रही है और क्षेत्र में गश्त बढ़ाई जाएगी। वहीं विधायक ने सरकार से आग्रह किया है कि उत्तराखंड की परिस्थितियों को देखते हुए वन अधिनियम में शिथिलता लाने की जरूरत है, ताकि मानव–वन्यजीव संघर्ष वाली परिस्थितियों में त्वरित निर्णय लिए जा सकें।





