
धर्म डेस्क: हिंदू परंपरा में प्रदोष व्रत भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष आराधना का दिन माना जाता है। प्रत्येक मास की शुक्ल और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर रखा जाने वाला यह व्रत मानसिक शांति, समृद्धि और पारिवारिक सौहार्द प्रदान करने वाला माना गया है। दिसंबर माह में पड़ने वाले दोनों प्रदोष व्रतों का महत्व और भी अधिक बताया जा रहा है।
प्रदोष व्रत का धार्मिक महत्व
हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का विशेष स्थान है। मान्यता है कि इस दिन समर्पित भाव से भगवान शिव की पूजा करने से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं, धन–समृद्धि बढ़ती है और जीवन की बाधाएँ दूर होती हैं। शाम के समय यानी प्रदोष काल में की गई प्रार्थनाओं का फल अत्यधिक शुभ माना जाता है।
दिसंबर का पहला प्रदोष व्रत — भौम प्रदोष
दृक पंचांग के अनुसार:
- मार्गशीर्ष शुक्ल त्रयोदशी तिथि:
2 दिसंबर को शाम 03:57 बजे प्रारंभ
3 दिसंबर को दोपहर 12:25 बजे समाप्त - व्रत की तिथि: 2 दिसंबर, मंगलवार (भौम प्रदोष)
- पूजा का शुभ समय (प्रदोष काल):
शाम 05:24 बजे से रात 08:07 बजे तक
दिसंबर का दूसरा प्रदोष व्रत — बुध प्रदोष
दृक पंचांग के अनुसार:
- पौष कृष्ण त्रयोदशी तिथि:
16 दिसंबर को दोपहर 11:57 बजे प्रारंभ
18 दिसंबर को रात 02:32 बजे समाप्त - व्रत की तिथि: 17 दिसंबर, बुधवार (बुध प्रदोष)
- पूजा का शुभ समय (प्रदोष काल):
शाम 05:27 बजे से रात 08:11 बजे तक
प्रदोष व्रत पूजा विधि
प्रदोष व्रत की पूजा भगवान शिव और माता पार्वती के प्रति भक्तिभाव व्यक्त करने का अवसर है। पूजा विधि इस प्रकार है:
- सुबह ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें और हल्के रंग के स्वच्छ वस्त्र पहनें।
- व्रत का संकल्प लें और दिनभर सात्त्विक रहें।
- सूर्यास्त के बाद पूजा की तैयारी करें।
- घर में शिवलिंग हो तो उसके सामने, अन्यथा मंदिर जाकर शिव–पार्वती की पूजा करें।
- शिवलिंग का गंगाजल, दूध, दही, शहद, घी और जल से अभिषेक करें।
- रोली, चंदन, पुष्प, धूप और गंगाजल अर्पित करें।
- कम से कम 108 बार “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करें।
- अंत में भगवान शिव से क्षमा याचना और कल्याण की प्रार्थना करें।







