
मसूरी: अगलाड़ यमुना घाटी विकास मंच द्वारा पारंपरिक बग्वाल (बूढ़ी दीपावली) उत्सव पूरे उत्साह के साथ मनाया गया। भीमल की लकड़ियों से बने होल्लों में अग्नि प्रज्वलन के साथ जब जयकारे गूंजे तो पूरा परिसर लोकगीतों, नृत्य और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन में डूब गया। यमुना और अगलाड़ घाटी के वे प्रवासी, जो अपने गांव नहीं जा सके, इस समारोह को अपनी संस्कृति का जीवंत स्वरूप बताकर भावुक दिखाई दिए।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
यमुना और अगलाड़ घाटी में सदियों से बग्वाल पर्व पारंपरिक रूप से मनाया जाता रहा है। माना जाता है कि भगवान राम की अयोध्या वापसी का संदेश पहाड़ों में देर से पहुंचा था, इसलिए यहां दीपावली ‘मंगसीर’ में मनाई जाती है। मसूरी में आयोजित यह कार्यक्रम उन्हीं पारंपरिक भावनाओं को पुनर्जीवित करता है, जिससे स्थानीय लोग और प्रवासी एक साथ संस्कृति से जुड़े रहते हैं।
कार्यक्रम का माहौल
रविवार को हुए इस आयोजन में पूरा परिसर लोक संस्कृति और पहाड़ी परंपराओं से सराबोर रहा। डिबसा की अग्नि के चारों ओर युवा, महिलाएं और बुजुर्ग रासौ, तांदी और सराई नृत्य करते देखे गए। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की ताल पर लोग झूमते रहे, जबकि बच्चों और युवाओं के लिए यह अपनी जड़ों से जुड़ने का अनूठा अवसर था।
प्रांगण में परोसे गए स्थानीय व्यंजन उड़द दाल के पकोड़े, साठी के चिउड़ा, भिरूड़ी और बराज घाटी के अखरोट लोगों में खास आकर्षण का केंद्र रहे। आयोजन में उपस्थित लोगों ने पहाड़ी व्यंजनों का भरपूर स्वाद लिया।
महिलाओं की रस्साकशी ने बढ़ाई रौनक
उत्सव के दौरान हुई रस्साकशी प्रतियोगिता में महिलाओं का प्रदर्शन सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। महिला टीम की जबरदस्त एकता और तालमेल के सामने विरोधी टीम टिक नहीं सकी। जीत के बाद महिलाओं को मिले उत्साह और समर्थन ने कार्यक्रम की ऊर्जा और बढ़ा दी। कई लोगों ने इसे महिलाओं की एकता और शक्ति का प्रतीक बताया।
विशेष अतिथियों के विचार
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि और भाजपा प्रदेश मंत्री नेहा जोशी ने कहा कि यमुना और अगलाड़ घाटी की संस्कृति उत्तराखंड की असली पहचान है। उन्होंने कहा कि यहां के लोग अपनी बोली, पहनावे और परंपराओं को गर्व के साथ निभा रहे हैं, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी द्वारा एमटी टोल चौकी के पास बन रहा सामुदायिक भवन भविष्य में सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित होगा।
पालिका अध्यक्ष मीरा सकलानी ने कहा कि मसूरी की खूबी यह है कि यहां हर क्षेत्र के लोग मिलजुलकर रहते हैं। उन्होंने पर्व का ऐतिहासिक संदर्भ बताते हुए कहा कि यह परंपरा पीढ़ियों से निभाई जा रही है। उन्होंने यमुना घाटी में पलायन की कम दर का श्रेय वहां के लोगों की आत्मनिर्भरता और संस्कृति से जुड़ाव को दिया।
स्थानीय मांगें और भविष्य की संभावनाएँ
अगलाड़ यमुना घाटी विकास मंच ने मांग रखी कि निर्माणाधीन सामुदायिक भवन को सांस्कृतिक धरोहर केंद्र घोषित किया जाए। मंच का कहना है कि ऐसा होने पर यह स्थल न केवल संस्कृति संरक्षण का केंद्र बनेगा, बल्कि क्षेत्र में पर्यटन का नया आकर्षण भी बन सकता है।







