
खटीमा (उधम सिंह नगर): भारत-नेपाल सीमा के झनकईया क्षेत्र में हर साल लगने वाला प्रसिद्ध सिंघाड़ा मेला इस बार भी सांस्कृतिक उत्सव का रूप ले चुका है। गंगा स्नान से शुरू हुआ यह दस दिवसीय मेला न केवल भारत बल्कि नेपाल के सैकड़ों लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। सिंघाड़े के स्वाद, परंपरा और व्यापार का यह संगम दोनों देशों की सांस्कृतिक विरासत को जोड़ने का काम कर रहा है।
उत्तराखंड का अनोखा सिंघाड़ा मेला
उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले के खटीमा क्षेत्र में हर साल ठंड के मौसम में लगने वाला सिंघाड़ा मेला अपने आप में अद्वितीय है। इस मेले की परंपरा कई दशकों पुरानी है, जहां भारत और नेपाल के लोग एक साथ आते हैं। स्थानीय थारू जनजाति के लोग धान या अन्य फसलों के बदले सिंघाड़ा खरीदते हैं — यह वस्तु विनिमय प्रणाली का जीवंत उदाहरण है, जो आज भी आधुनिक युग में कायम है।
व्यापार और परंपरा का संगम
उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों — जैसे पीलीभीत, बरेली, शाहजहांपुर, लखीमपुर और सीतापुर — से व्यापारी अपने परिवारों के साथ इस मेले में पहुंचते हैं। कई व्यापारी परिवार तीन से चार पीढ़ियों से इस परंपरा को निभा रहे हैं। प्रत्येक व्यापारी यहां प्रतिवर्ष लगभग 25 से 30 कुंतल सिंघाड़ा बेचकर अपनी आजीविका कमाता है। इस मेले में सिंघाड़े 20 से 25 रुपये प्रति किलो तक बिकते हैं।
नेपाल से भी उमड़ती भीड़
खटीमा के इस ऐतिहासिक मेले में नेपाल के सीमावर्ती इलाकों से हजारों लोग हर साल आते हैं। वे यहां से सिंघाड़ा खरीदकर अपने परिजनों को उपहार स्वरूप ले जाते हैं। पिछले 40–50 वर्षों से यह मेला भारत-नेपाल की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बन चुका है।
स्थानीय जनजीवन से जुड़ा उत्सव
ठंड के मौसम में सिंघाड़े का स्वाद स्थानीय लोगों के बीच विशेष लोकप्रियता रखता है। गुलाबी ठंड के इस मौसम में झनकईया का मेला पूरे शबाब पर है। चारों ओर सिंघाड़ों की सुगंध, व्यापारियों की आवाजें और पारंपरिक मेलों की रौनक ग्रामीण संस्कृति की झलक प्रस्तुत करती है।
सेहत का खजाना है सिंघाड़ा
दिल्ली के डॉ. राममनोहर लोहिया अस्पताल की डॉक्टर आयुषी जोशी के अनुसार,
“सिंघाड़ा एक जलीय फल है जिसमें कैलोरी कम और फाइबर प्रचुर मात्रा में होता है। यह पाचन तंत्र को स्वस्थ रखता है, ऊर्जा प्रदान करता है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। इसमें मौजूद पोटैशियम ब्लड प्रेशर नियंत्रित करता है, जबकि विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट स्किन और इम्यून सिस्टम के लिए फायदेमंद हैं।”
‘वोकल फॉर लोकल’ का संदेश
खटीमा का यह मेला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “वोकल फॉर लोकल” अभियान की भावना को भी मजबूत करता है। यहां स्थानीय उत्पादों का प्रचार-प्रसार होता है, जिससे छोटे व्यापारियों को आर्थिक बल मिलता है।
उत्तराखंड के अन्य प्रसिद्ध मेले
उत्तराखंड सदियों से मेलों और धार्मिक उत्सवों की धरती रहा है। हरिद्वार का कुंभ मेला, बागेश्वर का उत्तरायणी मेला, अल्मोड़ा का नंदा देवी मेला, चंपावत का पूर्णागिरि मेला और देवीधुरा का बग्वाल मेला अपनी विशिष्टता के लिए प्रसिद्ध हैं। इसी तरह देहरादून का झंडा मेला और श्रीनगर का वैकुंठ चतुर्दशी मेला भी उत्तराखंड की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान को बनाए हुए हैं। खटीमा का सिंघाड़ा मेला इन्हीं मेलों की श्रृंखला में एक जीवंत उदाहरण है।
स्थानीय प्रतिक्रिया
एक स्थानीय निवासी ने कहा, “सिंघाड़ा मेला केवल व्यापार नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति की पहचान है। नेपाल से आने वाले लोग भी इसमें भाग लेते हैं, जिससे दोनों देशों के बीच आत्मीय संबंध मजबूत होते हैं।”
आगे क्या
स्थानीय प्रशासन ने बताया कि मेले के सुचारू संचालन के लिए सुरक्षा, साफ-सफाई और यातायात प्रबंधन की विशेष व्यवस्था की गई है। मेले का समापन अगले सप्ताह गंगा स्नान के अंतिम दिन होगा।







