
नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने चमोली जिले के थराली तहसील में बीते 22 और 28 अगस्त को बादल फटने से आई आपदा के बाद राहत और पुनर्वास कार्यों में हो रही देरी पर गम्भीर रुख अपनाया है। अदालत ने इस मामले में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि राज्य सरकार द्वारा पेश की गई रिपोर्ट संतोषजनक नहीं है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता से कहा है कि वे एक सप्ताह के भीतर राज्य आपदा प्रबंधन की विस्तृत रिपोर्ट पेश करें।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
थराली तहसील में अगस्त 2025 के अंतिम सप्ताह में दो बार बादल फटने से भारी तबाही मची थी। कई लोग लापता हो गए थे, जबकि कई घर और पुल बह गए थे। आपदा के बाद राहत कार्यों और पुनर्वास को लेकर प्रशासन की धीमी कार्रवाई पर स्थानीय नागरिकों ने सवाल उठाए थे। इसी मामले में एक जनहित याचिका हाईकोर्ट में दायर की गई थी, जिसमें राज्य सरकार की लापरवाही का मुद्दा उठाया गया।
याचिकाकर्ता के तर्क और आरोप
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने राज्य सरकार की ओर से पेश की गई रिपोर्ट पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि —
- अब तक पीड़ितों को मुआवजा नहीं दिया गया है।
- कई लापता लोगों का सुराग नहीं लग पाया है।
- थराली अस्पताल बदहाल स्थिति में है और डॉक्टरों की नियुक्ति नहीं हो पाई है।
- गर्भवती महिलाओं को अन्य अस्पतालों में भेजा जा रहा है।
- आपदा प्रभावित इलाकों में अभी तक अर्ली वेदर वार्निंग सिस्टम नहीं लगाया गया है।
- राज्य आपदा प्रबंधन की गाइडलाइन अब तक वेबसाइट पर सार्वजनिक नहीं की गई है।
अदालत की टिप्पणियाँ और निर्देश
कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा पेश की गई रिपोर्ट पर्याप्त नहीं है और कई बिंदुओं पर स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। अदालत ने याचिकाकर्ता से कहा है कि वे राज्य आपदा प्रबंधन से संबंधित अपनी विस्तृत रिपोर्ट एक सप्ताह में पेश करें।
पहले की सुनवाई में अदालत ने सरकार से पूछा था कि — थराली के आपदा पीड़ित किन सुविधाओं से वंचित हैं, उनके पुनर्वास की क्या स्थिति है, और भविष्य के लिए राज्य सरकार की क्या नीति है। इन प्रश्नों पर सरकार की ओर से आज रिपोर्ट पेश की गई, लेकिन अदालत ने इसे अधूरी मानते हुए असंतोष जताया।
राज्य सरकार के लिए सख्त संदेश
पूर्व की सुनवाई में न्यायालय ने कहा था कि उत्तराखंड एक पर्वतीय राज्य है जहाँ बादल फटना, भूस्खलन और ग्लेशियरों का पिघलना जैसी घटनाएँ बार-बार होती हैं। इनसे निपटने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि ऐसी प्राकृतिक आपदाओं से न सिर्फ स्थानीय जनजीवन बल्कि राज्य का पर्यटन और व्यवसाय भी प्रभावित होता है, इसलिए सरकार को ठोस नीति बनानी होगी ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।
आगे क्या होगा
हाईकोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद निर्धारित की है। तब तक याचिकाकर्ता को अपनी रिपोर्ट और राज्य आपदा प्रबंधन से संबंधित तथ्यों को कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करना होगा। साथ ही, राज्य सरकार से भी कहा गया है कि वह राहत और पुनर्वास कार्यों की प्रगति रिपोर्ट अगली सुनवाई से पहले दाखिल करे।




