
यमकेश्वर: उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों की स्थिति दिन-प्रतिदिन चिंताजनक होती जा रही है। जनता द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधि जहां सरकार का समर्थन और सत्ता बनाने तक सीमित दिखाई दे रहे हैं, वहीं पहाड़ के वास्तविक विकास की दिशा में उनकी गंभीरता नदारद है।
ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं का ढांचा बुरी तरह चरमरा चुका है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल और यातायात जैसी बुनियादी व्यवस्थाएं बदहाल हालत में हैं। गांवों की जनता लगातार आवाज उठा रही है, लेकिन उनकी पुकार किसी जिम्मेदार तक नहीं पहुंच पा रही।
ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी शिक्षा प्रणाली पटरी से उतर चुकी है — कई स्कूल बंद होने की कगार पर हैं। स्वास्थ्य सेवाएं केवल फर्स्ट एड तक सीमित हैं। राज्य के कई क्षेत्रों में गंभीर बीमार मरीज और गर्भवती महिलाएं समय पर अस्पताल नहीं पहुँच पातीं, और कई बार रास्ते में ही उनकी जान चली जाती है। हालात इतने चिंताजनक हैं कि कुछ अस्पतालों में डॉक्टर मरीजों का इलाज करने के लिए मोबाइल की टॉर्च तक जलाने को मजबूर हैं।
यातायात की हालत भी किसी से छिपी नहीं है। सड़कों की जगह अब गड्ढे हैं और कई गांवों का संपर्क मार्ग बरसात के बाद पूरी तरह टूट जाता है। जल जीवन मिशन जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं भी केवल टंकियां बांटने तक ही सीमित रह गई हैं, जबकि पाइपलाइन बिछाने का काम सालों से अधर में लटका हुआ है।
ग्रामीण बताते हैं कि नदियों पर पुलों की स्वीकृति तो चुनावी मौसम में मिल जाती है, लेकिन काम शुरू नहीं होता। वहीं, कुछ प्रतिनिधियों का विकास केवल अंग्रेजी शराब के ठेकों तक सीमित दिख रहा है, जो अब गांव-गांव तक फैल चुके हैं।
पहाड़ के लोग अब पूछ रहे हैं — क्या उनका प्रतिनिधित्व सिर्फ सत्ता समर्थन के लिए है, या उनके विकास के लिए भी कोई जिम्मेदारी तय होगी?







