
पिथौरागढ़: उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी भाई दूज और गोवर्धन पूजा के अवसर पर पारंपरिक रूप से चूड़ा कूटने की प्रथा जारी है। कार्तिक माह कृष्ण पक्ष की एकादसी को नए अनाज धान को भिगोया जाता है और गोवर्धन पूजा के दिन ओखली में मूसलों से कूट कर देवताओं को भेंट किया जाता है। इसके बाद बहनें अपने भाइयों के सिर पर तिलक कर उन्हें चूड़ा खिलाती हैं।
चूड़ा कूटने की प्रक्रिया और परंपरा
सीमांत पिथौरागढ़ के थल क्षेत्र के करेला गांव में आज भी महिलाएं पारंपरिक कुमाउनी परिधान पहनकर चूड़ा कूटती हैं। यहां के आधा दर्जन परिवार की महिलाएं आग में भिगोए हुए धान को भूनकर ओखली में कूटती हैं। इस परंपरा को निभाने में गांव की 65 वर्षीय गोविंदी पन्त, 62 वर्षीय मालती पन्त, 57 वर्षीय भारती उपाध्याय, पिंकी पन्त, कंचन पन्त, ज्योति उपाध्याय, दीपा पन्त और सरोज पन्त सहित अन्य महिलाएं सक्रिय रूप से भाग लेती हैं।
धान को कई दिनों तक भिगोने के बाद लोहे की कढ़ाई में भूनकर मूसलों से ओखली में कूटने की प्रक्रिया संपन्न की जाती है। कूटे हुए चूड़े से छिलके और साबुत धान को सूप में साफ किया जाता है।
चूड़ा पूजने की परंपरा
गोवर्धन पूजा के दिन ओखली और मूसलों की पूजा की जाती है। यह कामना की जाती है कि घर में सालभर अनाज की कमी न हो। भाई दूज के दिन चूड़ा पहले कुलदेवता और घर के मंदिर में चढ़ाया जाता है। इसके बाद सरसों के तेल और दूब घास की सहायता से परिवार के सभी सदस्यों का तिलक किया जाता है। बहनें अपने भाइयों को चूड़ा खिलाती हैं और प्रसाद के रूप में इसे परिवार और पड़ोसियों में बांटा जाता है।
इस प्रथा के माध्यम से उत्तराखंड के ग्रामीण समुदाय में न केवल भाई-बहन का स्नेह प्रकट होता है, बल्कि सालभर खुशहाली और फसल की समृद्धि की कामना भी की जाती है।







