
धर्म डेस्क: भाई दूज, दिवाली के तीसरे दिन मनाया जाने वाला एक ऐसा पर्व है, जो भाई-बहन के अटूट प्रेम और विश्वास को उजागर करता है। भारत के अलग-अलग हिस्सों में इसे भैया दूज, भाऊ बीज, भात्र द्वितीया या यम द्वितीया जैसे नामों से जाना जाता है। इस दिन बहनें व्रत रखती हैं, अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाती हैं, मिठाइयां खिलाती हैं और उपहारों का आदान-प्रदान करती हैं। यह रस्म न केवल रिश्तों को मजबूत करती है, बल्कि यमराज और यमुना की पौराणिक कथा से जुड़ा इसका गहरा आध्यात्मिक महत्व भी है। आइए, इस पर्व की कहानी, शुभ मुहूर्त और परंपराओं को एक ताजा अंदाज में जानें।
भाई दूज की पौराणिक कथा: यम और यमुना का प्रेम
भाई दूज की कहानी सूर्य देव और उनकी पत्नी छाया की संतानों, यमराज और यमुना, से शुरू होती है। यमराज मृत्यु के देवता थे, जबकि यमुना एक पवित्र नदी के रूप में पूजी जाती थीं। यमुना अपने भाई यमराज से बेहद स्नेह करती थीं और हमेशा चाहती थीं कि वे उनके घर आएं और उनके हाथ का बना भोजन खाएं। वे बार-बार निमंत्रण भेजतीं, लेकिन यमराज अपने व्यस्त कार्यों के कारण हर बार इसे टाल देते।
एक दिन, कार्तिक मास की शुक्ल द्वितीया को यमराज अचानक यमुना के घर पहुंचे। भाई को देखकर यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने पूरे प्रेम और उत्साह से यमराज का स्वागत किया, उनके माथे पर तिलक लगाया, आरती उतारी और स्वादिष्ट भोजन परोसा। यमुना के इस स्नेह और आतिथ्य से यमराज इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने अपनी बहन से कोई वर मांगने को कहा।
यमुना ने कहा, “हर साल इस दिन आप मेरे घर आएं, और जो बहन अपने भाई को तिलक करके प्रेम से भोजन कराए, उसके भाई को लंबी उम्र और यमलोक का भय न हो।” यमराज ने यह वरदान दे दिया। तभी से भाई दूज की परंपरा शुरू हुई, जिसमें बहनें अपने भाइयों की सलामती और समृद्धि के लिए तिलक करती हैं। यह कथा भाई-बहन के रिश्ते में प्रेम, सेवा और विश्वास की गहराई को दर्शाती है।
भाई दूज का सांस्कृतिक महत्व
भाई दूज का यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भाई-बहन के बंधन को मजबूत करने का एक भावनात्मक अवसर है। इस दिन बहनें व्रत रखती हैं और अपने भाइयों के लिए प्रार्थना करती हैं। तिलक, मिठाई और उपहारों का आदान-प्रदान इस रिश्ते में मिठास और गर्मजोशी भरता है। चाहे वह उत्तर भारत में भैया दूज हो, महाराष्ट्र में भाऊ बीज, या दक्षिण भारत में यम द्वितीया, यह पर्व हर जगह प्रेम और विश्वास का प्रतीक है।
भाई दूज 2025: शुभ मुहूर्त और पूजा की तैयारी
भाई दूज 2025 की तिथि 22 अक्टूबर 2025 को रात 8:16 बजे से शुरू होगी और 23 अक्टूबर 2025 को रात 10:46 बजे तक रहेगी। इस दौरान सबसे शुभ मुहूर्त 23 अक्टूबर को दोपहर 1:13 बजे से 3:28 बजे तक रहेगा। इस समय बहनें अपने भाइयों को तिलक लगाकर उनकी लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करें।
पूजा की सरल विधि
- थाली तैयार करें: एक साफ थाली लें, उस पर हल्दी-कुमकुम से स्वस्तिक बनाएं। इसमें रोली, चावल, दीया, मिठाई (लड्डू, पेड़ा), फूल, नारियल, सुपारी, पान का पत्ता और गंगाजल रखें।
- तिलक और आरती: भाई को पूर्व या उत्तर दिशा में बिठाएं। उनके माथे पर रोली और चावल से तिलक लगाएं, फिर आरती करें।
- मिठाई और उपहार: भाई को मिठाई खिलाएं और नारियल भेंट करें। इसके बाद उपहारों का आदान-प्रदान करें।
- आशीर्वाद: भाई अपनी बहन को आशीर्वाद और उपहार दें, जिससे रिश्ता और मजबूत हो।
भाई दूज की खासियत: प्रेम और विश्वास का बंधन
भाई दूज का यह त्योहार भाई-बहन के रिश्ते को नई ताजगी और गहराई देता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि प्रेम और विश्वास से भरा रिश्ता हर मुश्किल को आसान बना सकता है। इस दिन का तिलक और आशीर्वाद भाई के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और आत्मविश्वास लाता है। चाहे आप इसे भैया दूज कहें या यम द्वितीया, यह पर्व हर रूप में प्रेम और समर्पण का उत्सव है।







