
देहरादून: उत्तराखंड के बदरीनाथ और केदारनाथ धाम में गैर सनातनियों के प्रवेश पर रोक लगाने के फैसले ने प्रदेश की राजनीति को गरमा दिया है। श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) के इस निर्णय पर सत्ताधारी भाजपा और विपक्षी दलों के बीच तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है।
बीकेटीसी के फैसले से बढ़ा विवाद
10 मार्च को हुई बोर्ड बैठक में बीकेटीसी ने बदरीनाथ और केदारनाथ धाम के परिसर और गर्भगृह में गैर सनातनियों के प्रवेश पर रोक लगाने का निर्णय लिया था। इस फैसले के बाद यह मुद्दा तेजी से राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया।
बीकेटीसी अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी के बयान ने विवाद को और हवा दी, जिसमें उन्होंने कहा कि गैर सनातनी यदि दर्शन करना चाहते हैं तो उन्हें अपनी आस्था को लेकर शपथ पत्र देना होगा। हालांकि बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रवेश पर रोक लागू रहेगी।
भाजपा ने किया समर्थन
भाजपा ने इस फैसले को हिंदू आस्था से जुड़ा बताते हुए इसका समर्थन किया है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कहा कि चारधाम हिंदुओं की आस्था के केंद्र हैं और यहां गैर सनातनियों का प्रवेश वर्जित होना चाहिए। इसे राजनीति के बजाय आस्था के सम्मान के रूप में देखा जाना चाहिए।
प्रदेश भाजपा महामंत्री कुंदन परिहार ने भी कहा कि हिंदू सभी मतों का सम्मान करते हैं, लेकिन आस्था का अनादर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
कांग्रेस और विपक्ष का विरोध
वहीं कांग्रेस ने इस फैसले को संविधान के मूल्यों के खिलाफ बताया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, जहां सभी नागरिकों को धार्मिक स्थलों पर जाने का अधिकार है। ऐसे में किसी वर्ग के प्रवेश पर रोक सामाजिक सौहार्द को प्रभावित कर सकती है।
समाजवादी पार्टी के नेता डा. एसएन सचान ने इसे संकीर्ण मानसिकता बताया, जबकि उक्रांद के केंद्रीय अध्यक्ष सुरेंद्र कुकरेती ने भी इस मुद्दे पर स्पष्टता की जरूरत बताई।
चुनावी मुद्दा बनने के संकेत
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए यह मुद्दा आने वाले समय में और तूल पकड़ सकता है। आस्था बनाम संविधान की बहस के बीच यह मामला प्रदेश की राजनीति में बड़ा मुद्दा बनता दिख रहा है।






