
देहरादून: देहरादून के थानो स्थित लेखक गांव में शुक्रवार शाम साहित्य और संवेदना से भरी एक यादगार महफिल सजी। सात दिवसीय विरासत कला उत्सव की शुरुआत कवि सम्मेलन के साथ हुई, जहां देश के अलग-अलग राज्यों से आए कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। देर रात तक कविता, व्यंग्य और भावनाओं की धारा बहती रही और सभागार तालियों की गूंज से गूंजता रहा।
इस आयोजन का संयुक्त रूप से उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार, स्पर्श हिमालय विश्वविद्यालय और लेखक गांव द्वारा किया जा रहा है। उद्घाटन समारोह में पारिस्थितिकी पर्यटन परिषद के उपाध्यक्ष ओम प्रकाश जमदग्नि मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।
कवियों की रचनाओं ने बांधा श्रोताओं को
कवि सम्मेलन में देशभर से आए कवियों ने अपनी रचनाओं से कार्यक्रम को जीवंत बना दिया। दिल्ली के कवि डॉ. रसिक गुप्ता ने अपनी ओजपूर्ण कविता
“पथ प्रदर्शक बनी युगों से, है कलम की धार ही,
सार्थक हो जिंदगी, बेशक जिएं दिन चार ही”
का पाठ कर श्रोताओं की खूब सराहना बटोरी।
उत्तर प्रदेश से आए डॉ. अर्जुन सिसोदिया ने समसामयिक व्यंग्य से भरपूर कविता सुनाई, जिसमें उन्होंने कहा—
“चिंगारी जहां-जहां दीखे, ले जाकर आंधी रखते हो,
सीने में नफरत रखते हो, होठों पर गांधी रखते हो।”
मध्य प्रदेश के कवि राकेश दांगी ने भी अपनी रचना से सभागार को भावविभोर कर दिया। उन्होंने अपनी कविता में कहा—
“संपूर्ण विश्व के सहायक आए हैं,
सृष्टि के प्रथम गायक आए हैं।”
नारी शक्ति और देशभक्ति पर भी गूंजी कविताएं
दिल्ली से आईं कवयित्री सरला मिश्रा ने नारी शक्ति पर आधारित अपनी भावपूर्ण रचना प्रस्तुत करते हुए कहा—
“प्रभु की एक अलौकिक रचना, दो कुलतारी है,
सृष्टि का आधार जगत में, होती नारी है।”
वहीं दिल्ली के कवि श्रीकांत श्री ने हास्य-व्यंग्य से माहौल को हल्का कर दिया। डॉ. ऋतु सिंह ने देशभक्ति से ओतप्रोत कविता
“अपनी आंखों में ख्वाबों की बारात है,
सरहदों पर सिपाही जो तैनात है”
सुना कर श्रोताओं में जोश भर दिया।
स्थानीय प्रतिक्रिया
कवि सम्मेलन का संचालन शिवम ढौंडियाल ने किया। कार्यक्रम में गणेश खुगशाल ‘गणी’, डॉ. सर्वेश उनियाल और सुदेश शर्मा सहित कई साहित्य प्रेमी मौजूद रहे। श्रोताओं ने कवियों की रचनाओं का भरपूर आनंद लिया और पूरे कार्यक्रम के दौरान सभागार तालियों से गूंजता रहा।







