
देहरादून: उत्तराखंड को लंबे समय से एजुकेशन हब और शांत प्रदेश के रूप में जाना जाता है, लेकिन बीते कुछ वर्षों में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों, खासकर मेडिकल कॉलेजों से सामने आ रहे रैगिंग के मामलों ने इस छवि को गहरी चोट पहुंचाई है। दून मेडिकल कॉलेज में जनवरी 2026 में सामने आई रैगिंग और मारपीट की ताजा घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि सरकार, पुलिस-प्रशासन और कॉलेज प्रशासन की सख्ती के बावजूद आखिर रैगिंग जैसी घटनाएं क्यों नहीं रुक पा रही हैं।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
उत्तराखंड में रैगिंग की घटनाएं अब अपवाद नहीं रहीं। बीते कुछ वर्षों में श्रीनगर, हल्द्वानी, पंतनगर और देहरादून जैसे प्रमुख शैक्षणिक केंद्रों से लगातार ऐसे मामले सामने आए हैं। इन घटनाओं ने छात्रों और अभिभावकों के बीच डर और असुरक्षा की भावना को बढ़ाया है, साथ ही राज्य की शैक्षणिक प्रतिष्ठा पर भी सवाल खड़े किए हैं।
दून मेडिकल कॉलेज का ताजा मामला
जनवरी 2026 की शुरुआत में देहरादून स्थित राजकीय दून मेडिकल कॉलेज में 2025 बैच के एक एमबीबीएस छात्र के साथ गंभीर मारपीट की घटना सामने आई। हैरान करने वाली बात यह रही कि मारपीट करने वाला छात्र भी उसी बैच का बताया गया, जिसने 2023 और 2024 बैच के दो सीनियर छात्रों के दबाव में यह कदम उठाया। मामला सामने आते ही कॉलेज प्रशासन में हड़कंप मच गया।
जांच और प्रशासनिक कार्रवाई
कॉलेज प्रशासन ने बिना देरी किए दोनों सीनियर छात्रों के अभिभावकों को तलब किया और मामले की जांच एंटी रैगिंग कमेटी को सौंपी। जांच में स्पष्ट हुआ कि यह केवल आपसी झगड़ा नहीं था, बल्कि इसके पीछे जूनियर छात्रों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने की प्रवृत्ति भी शामिल थी।
जांच रिपोर्ट के आधार पर कॉलेज प्रशासन ने नौ एमबीबीएस छात्रों को तीन महीने के लिए शैक्षणिक गतिविधियों से निष्कासित कर दिया। इनमें से दो छात्रों पर सबसे सख्त कार्रवाई करते हुए 50-50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया और उन्हें छात्रावास से स्थायी रूप से बाहर कर दिया गया। अन्य सात छात्रों पर भी अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई।
छोटी घटना भी रैगिंग है
दून मेडिकल कॉलेज के मीडिया इंचार्ज और नेत्र विभागाध्यक्ष डॉ. सुशील ओझा ने स्पष्ट किया कि रैगिंग केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है। किसी छात्र को मानसिक रूप से डराना, अपमानित करना या दबाव बनाना भी रैगिंग की श्रेणी में आता है और ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई की जाएगी।
कॉलेज प्रशासन की सख्ती
कॉलेज की प्राचार्य डॉ. गीता जैन ने एंटी रैगिंग सेल को दोबारा सक्रिय करते हुए कैंपस में सुबह और शाम नियमित गश्त के निर्देश दिए हैं। हॉस्टल सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया गया है और एमबीबीएस प्रथम वर्ष के छात्रावास के बाहर अतिरिक्त सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की गई है।
क्या यह पहला मामला है?
दून मेडिकल कॉलेज की घटना नई जरूर है, लेकिन उत्तराखंड में रैगिंग का यह पहला मामला नहीं है।
श्रीनगर मेडिकल कॉलेज में 2021 में एमबीबीएस प्रथम वर्ष के छात्र की शिकायत पर जांच हुई थी, जिसमें 2019 और 2020 बैच के सात सीनियर छात्रों को निलंबित कर हॉस्टल से निष्कासित किया गया। इससे पहले 2017 में भी वहां रैगिंग का मामला सामने आ चुका है।
इसी तरह हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज में 2022 और 2023 में वायरल वीडियो के बाद रैगिंग का बड़ा मामला उजागर हुआ, जिसमें 121 छात्रों पर जुर्माना लगाया गया। मार्च 2024 में फिर एक मामला सामने आया, जहां पांच छात्रों को हॉस्टल से निष्कासित किया गया।
आखिर क्यों नहीं रुक रही रैगिंग?
इस सवाल पर उच्च शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत ने कहा कि संस्कृति के नाम पर गलत परंपराओं को किसी भी शिक्षा संस्थान में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यदि कहीं रैगिंग की घटना होती है तो सरकार तत्काल कार्रवाई करती है।
विशेषज्ञों की राय
डॉ. सुशील ओझा का मानना है कि कानून कितने भी सख्त क्यों न हों, अपराध पूरी तरह खत्म नहीं होते। कई बार छात्र जिज्ञासावश या दबाव में आकर गलत कदम उठा लेते हैं। उन्होंने यूजीसी की गाइडलाइन में संशोधन की आवश्यकता भी जताई, ताकि छोटे-मोटे मामलों और गंभीर रैगिंग के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सके।
आगे क्या होगा
लगातार सामने आ रहे मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल कार्रवाई ही नहीं, बल्कि छात्रों की काउंसलिंग, जागरूकता और मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीरता से काम करने की जरूरत है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक कॉलेज स्तर पर संवाद और भरोसे का माहौल नहीं बनेगा, तब तक रैगिंग जैसी घटनाओं पर पूरी तरह रोक लगाना मुश्किल रहेगा।




