
ऋषिकेश के बापूग्राम और आसपास के क्षेत्रों में वन विभाग की संभावित कार्रवाई को लेकर गहराए डर के बीच नगर निगम पार्षद अभिनव सिंह मलिक ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को ज्ञापन भेजा है। ज्ञापन में सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश के बाद बापूग्राम, पशुलोक और शिवाजी नगर क्षेत्र में रहने वाली लगभग एक लाख आबादी की चिंता और असुरक्षा का उल्लेख किया गया है। पार्षद ने इस मुद्दे को महात्मा गांधी की विरासत और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन के अधिकार से जोड़ते हुए कांग्रेस नेतृत्व से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
सुप्रीम कोर्ट में चल रहे एक वाद के बाद ऋषिकेश के कुछ पुराने बसे क्षेत्रों को वन भूमि मानते हुए कार्रवाई की आशंका जताई जा रही है। इससे दशकों से रह रहे लोगों के बीच भय और असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
ऐतिहासिक आधार का हवाला
पार्षद अभिनव सिंह मलिक ने अपने ज्ञापन में उल्लेख किया है कि वर्ष 1946–47 में, जब देश आजादी की दहलीज पर था, तत्कालीन संयुक्त प्रांत सरकार ने महात्मा गांधी की शिष्या मीरा बेन (मैडलिन स्लेड) को ऋषिकेश के वीरभद्र ब्लॉक में लगभग 1,000 हेक्टेयर वन भूमि आवंटित की थी। इस भूमि पर पशुलोक आश्रम की स्थापना के साथ-साथ विभाजन पीड़ित शरणार्थियों, स्वतंत्रता सेनानियों और भूमिहीन गरीबों के पुनर्वास का उद्देश्य था।
बापू की विरासत का उल्लेख
ज्ञापन में यह भी कहा गया है कि स्वयं महात्मा गांधी ने 16 जनवरी 1948 को पत्र लिखकर इस क्षेत्र का नाम “पशुलोक” सुझाया था। यह क्षेत्र आज भी उस ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक माना जाता है।
स्थानीय / मानवीय चिंता
पार्षद का कहना है कि जिस जनता को सरकार ने खुद बसाया और बीते 60–70 वर्षों से बिजली, पानी, सड़क, स्कूल, अस्पताल, राशन कार्ड और वोटर आईडी जैसी सुविधाएं दीं, आज उसी जनता को अतिक्रमणकारी बताया जा रहा है। स्थानीय लोगों में अपने घर और भविष्य को लेकर गहरी चिंता है।
राहुल गांधी से अपील
अभिनव सिंह मलिक ने राहुल गांधी से आग्रह किया है कि वे आगामी संसद सत्र में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाएं। साथ ही केंद्र सरकार पर दबाव बनाकर संसद और राज्य विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की मांग करें। इस सत्र में बापूग्राम, पशुलोक और शिवाजी नगर जैसे पुराने बसे क्षेत्रों को वन कानूनों के दायरे से बाहर कर तत्काल राजस्व ग्राम घोषित करने का प्रस्ताव रखा जाए।
आगे क्या होगा
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और नागरिकों को उम्मीद है कि राजनीतिक स्तर पर हस्तक्षेप होने से इन क्षेत्रों में रहने वाली आबादी को राहत मिलेगी और वर्षों पुरानी बस्तियों का भविष्य सुरक्षित किया जा सकेगा।




